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"हमारे लेखन में प्रवासी जीवन की समस्याएँ और उपाय" - हि.रा.गि. ने की चर्चा

१० मार्च २०१८, हिंदी राइटर्स गिल्ड की मासिक रिपोर्ट

 हिंदी राइटर्स गिल्ड कैनाडा की बहुआयामी जानी-मानी संस्था है। इसका उद्देश्य हिंदी के प्रचार-प्रसार के अतिरिक्त नए-नए विषयों पर चर्चा करना भी है। मार्च २०१८ की मासिक गोष्ठी का विषय था "हमारे लेखन में प्रवासी जीवन की समस्याएँ और उपाय"।

सर्वप्रथम उपस्थित सभी कविगण और श्रोताओं ने गर्म चाय के साथ समोसे, सैंडविच और मिठाई का आनंद उठाया। चाय नाश्ते का प्रबंध इस बार डॉ. शैलजा सक्सेना (संस्थापक निदेशिका हि.रा.गि) की ओर से किया गया था। तत्पश्चात कार्यक्रम को आरम्भ करते हुए आज की गोष्ठी के संचालक श्री सुमन कुमार घई (संस्थापक निदेशक हि.रा.गि.) ने ब्रैमप्टन लाइब्रेरी की एडल्ट एंड डाइवर्सिटी लाईब्रेरियन श्रीमती अनिता खुराना को मंच पर आमंत्रित किया। अनिता जी ने लाइब्रेरी की अनेक सुविधाओं के साथ-साथLocal Authors Showcase 2018-19  के बारे में सभी को जानकारी दी। इस प्रोग्राम के अंतर्गत - जिन लेखकों की पुस्तकें २०१३ से २०१८ के बीच प्रकाशित हुई हैं, पील रिजन के निवासी हैं और लाईब्रेरी के सदस्य हैं; वे सभी लेखक अपनी अधिकतम तीन पुस्तकें इस लाइब्रेरी में रख सकते हैं। उन्होंने इस प्रक्रिया के नियमों से भी अवगत कराया।

तत्पश्चात श्री सुमन घई (संस्थापक निदेशक हि.रा.गि.) कार्यक्रम आरम्भ करते हुए कहा कि विदेशों में रचा गया साहित्य केवल इसलिए प्रवासी जीवन का साहित्य नहीं कहला सकता क्योंकि कथानक का परिप्रेक्ष्य विदेशी है अपितु कथा कहते हुए लेखक के दृष्टिकोण का प्रवासी होना अनिवार्य है जो कि स्वतः कथानक में परिलक्षित होता है।
इसके बाद उन्होंने इस सत्र की प्रथम वक्ता श्रीमती सविता अग्रवाल को मंच पर आमंत्रित किया। सविता जी ने प्रवासियों के व्यस्त जीवन के रहते लेखन में जो कठिनाइयाँ आती हैं, उस पर अपने विचार रखे। उन्होंने बढ़ती उम्र की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को भी लेखन में बाधक बताया। विदेश में रहकर भी भारतीय होने के नाते लेखन में भारतीयता की झलक होना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि कभी-कभी लगता है कि हम पूर्णरूप से न ही भारतीय रहे और न ही विदेशी।

अगली वक्ता श्रीमती आशा बर्मन ने भारत जाने पर उन्हें क्या-क्या अनुभव होते हैं, इस पर अपनी बहुत सी बातें बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत कीं। आशा जी ने यह भी कहा कि शादियों में आजकल तीन-तीन दिन के कार्यक्रम होते हैं, उससे ख़र्चा तो होता ही है साथ-साथ शादी के हर समारोह में उपस्थित होना संभव नहीं होता है। इस धरती पर उन्हें एक लंबा समय बीत गया है फिर भी पूरी तरह अपने को कैनेडियन नहीं कह सकती हैं।

डॉ. शैलजा सक्सेना ने भी इस विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि यहाँ आर्थिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक समस्याएँ आती हैं। आर्थिक तौर पर सभी में एक होड़ लगी रहती है। शैलजा जी ने अपनी एक कविता “विदेश में रहती है” की प्रस्तुति की। उन्होंने अपनी कहानी “उसका जाना” के अंश को उद्धृत करते हुए भारत से उखड़ कर विदेश में स्थापित न हो पाने की कुंठा से पैदा हुए टूटते परिवार, संबंधों और बच्चों के खोते बचपन के बारे बात की। उन्होंने यह भी कहा कि क्या हम अपने लेखन में समाज की मुख्य घटनाओं को समेट रहे हैं? हमें अपना दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा। कैनेडियन दृष्टिकोण को अपना कर ही साहित्यिक रचनायें करनी होंगी।

श्रीमती प्रवीण कौर ने अपने जीवन के अनेक खट्टे-मीठे अनुभव सांझा किये और अपनी एक अंग्रेज़ी की कविता का पाठ किया।

श्रीमती भुवनेश्वरी पाण्डेय ने अपने विचार रखते हुए अपनी एक कहानी के बारे चर्चा की जिसमें यहाँ एक ऐसी नव विवाहिता महिला की मनः स्थिति के बारे में बताया जिसकी भ्रूण हत्या उसके ही पति द्वारा करवा दी गयी थी क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति इस योग्य नहीं थी कि वे बच्चे का ख़र्च उठा सकें। अपनी कहानियों में उन्होंने कैनेडा में हो रही अनेक घटनाओं के वर्णन से पाठकों को अवगत कराया। यहाँ यदि किसी की मृत्यु हो जाती है, उसके भी कितने दिनों के कार्यक्रम होते हैं के आधार पर लिखी अपनी व्यंग्य कविता “मेरी शवयात्रा कैनेडा में” सुनाई।

अगली लेखिका श्रीमती श्यामा सिंह ने दोनों पीढ़ियों के अंतर के साथ तालमेल मिलाने के लिए स्वयं को बदलने पर ज़ोर दिया। जैसा माहौल है उसमें अपने को ढालने की बात कही। श्यामा जी ने आजकल बच्चों की मानसिकता के बारे में बताते हुए कहा कि बच्चे भी अनेक तनावों में रहतें हैं| उन्हें यहाँ के वातावरण में ही अपने को ढालना होता है। उन्होंने अपनी कविताओं “परिवर्तन” और “पंख” की प्रस्तुति की।

श्री सुमन कुमार घई ने अपनी कहानी “असली नक़ली” की चर्चा करते हुए कहा कि जो श्यामा जी का दृष्टिकोण है उससे उलट उनकी कहानी में कैनेडा में पली=बढ़ी युवा पीढ़ी का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है। इस कहानी के दो मुख्य पात्र युगल प्रेमी अपने माता-पिता के सांस्कृतिक विचारों और जीवन शैली की विसंगतियों की ओर इंगित करते हुए कहते हैं , “क्या करें दो संस्कृतियों का टकराव है। और हमारी पीढ़ी अपनी संस्कृति का अन्वेषण स्वयं ही कर रही है। माँ-बाप भारतीय संस्कृति हम पर लाद देना चाहते हैं, जबकि स्वयं वह भी उसका अनुसरण नहीं करते।" 

श्री संजीव अग्रवाल ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि जब हम प्रवासी होने के नाते यहाँ के लोगों के साथ मिलते-जुलते हैं तो हम उनकी बातों में व्यंग्य और चुटकुलों का पूर्ण रूप से आनंद नहीं ले पाते हैं और हँसने से वंचित रह जाते हैं। इसलिए हास्य के लिए, जो कि जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है, हमें अपने ही समाज पर निर्भर होना पड़ता है।

श्री विजय विक्रांत (संस्थापक निदेशक हि.रा.गि.) ने भी जीवन में बदलाव लाने की बात की।
श्रीमती प्रमिला भार्गव ने लेखक को स्वतंत्र रूप से अपने अन्तरंग स्वभाव के आधार पर लिखने की बात पर ज़ोर दिया। उन्होंने भी यहाँ के जीवन की व्यस्तता को लेखन में बाधक बताया। हिंदी भाषा सीखने की समस्या को समाप्त करने के लिए उन्होंने हिंदी के नाटक, सीरियल्स और फ़िल्मी गाने सुनने और देखने को एक सबल माध्यम बताया। अपने लेखन को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए उनका कहना है कि “करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान”।

तत्पश्चात डॉ. नरेन्द्र ग्रोवर ने हिंदी, उर्दू, और अंग्रेज़ी की मिली-जुली एक व्यंग्यात्मक कविता “यहाँ पब में रोमियो” की प्रस्तुति की।

चिन रेडियो की प्रोड्यूसर और परिचारिका श्रीमती अरूज राजपूत ने तरबियत और तालीम की बात की और कहा कि जो मीडिया सिखा रहा है वही हम और हमारे बच्चे सीख रहे हैं। आज की टैक्नोलोजी को सीखना भी आवश्यक है। उन्होंने अपनी “बेचैनगी” नामक नज़्म की प्रस्तुति की।

श्री इकबाल बरार ने अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर सभी महिलाओं को बधाई देते हुए उनके योगदान की सराहना की और कहा कि महिलायें अपने वजूद को भुलाकर मकान को घर बनाती हैं। उसके बाद उन्होंने साहिर लुध्यानवी द्वारा रचित एक प्रसिद्ध फ़िल्मी गीत “औरत ने जन्म दिया मर्दों को” की प्रस्तुति की। इस प्रकार पूरे हर्षोल्लास और ज्ञानवर्धन के साथ, सफ़लतापूर्वक, इस गोष्ठी का समापन हुआ।

प्रस्तुति - सविता अग्रवाल ’सवि’; सुमन कुमार घई

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