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मासिक गोष्ठी नवंबर २०१८

हिन्दी राइटर्स गिल्ड की नवम्बर की गोष्ठी

 

१० नवम्बर, २०१८- हिन्दी राइटर्स गिल्ड की मासिक गोष्ठी आज ब्रैमप्टन लाइब्रेरी की स्प्रिंगडेल शाखा के सभागार में संपन्न हुई। पतझड़ के बदलते रंगों और ठण्डी हवा के झोंकों से आने वाली शरद ऋतु का आभास हो रहा था, परन्तु उपस्थित लेखकों में साहित्यिक उष्णता का संचार हो रहा था।

आज की गोष्ठी के संचालन का कार्यभार डॉ. नरेन्द्र ग्रोवर ने सँभाला और कार्यक्रम को शुरू करते हुए उन्होंने बताया कि आज की गोष्ठी में रचना-पाठ के दो दौर होंगे।

कार्यक्रम के पहले कवि थे श्री सतीश सेठी। उन्होंने अपनी कविता में बिखरते हुए परिवार की पीड़ा को अभिव्यक्त किया। इनके बाद  कवयित्री थीं श्रीमती प्रेम और उनकी कविता का शीर्षक था “गुलशन”। अगले कवि श्री बालकृष्ण शर्मा थे। उन्होंने अपनी कविता “वो पल” में प्रेमियों के हृदय मिलन की बात करते हुए कविता को छायावाद की ओर मोड़ दिया और प्रेम, मानव और परमात्मा के संबंधों में परिवर्तित हो गया। इसके बाद श्री निर्मल सिद्धू ने अपने काव्य पाठ को दीपावली के कुछ हाइकु सुनाते हुए आरम्भ किया और इस भूमिका के बाद दीपावली के उपलक्ष्य में अपनी ग़ज़ल सुनाई जिसके बोल थे “दीवाली के दीये घर घर जलेंगे”। अगली कवयित्री श्रीमती सविता अग्रवाल ’सवि’ थीं। उन्होंने अपनी कविता में बचपन की मीठी यादों को सजीव किया। श्री संजीव अग्रवाल ने श्री अशोक चक्रधर की व्यंग्य कविता सुनाई जिसमें धूम्रपान पर गहरा कटाक्ष था। श्री अखिल भण्डारी की ग़ज़ल पहली पंक्ति थी “किसी बेदस्तोपा की राह से काँटे हटा देना”। डॉ. नरेन्द्र ग्रोवर ने अपने मनमोहक अंदाज़ में कविता पाठ किया और पहले दौर का अंत सुमन कुमार घई की एक पुरानी कविता “पुष्प की कामना” से हुआ।

पहले दौर के बाद एक छोटा अंतराल हुआ जिसमें उपस्थित साहित्य प्रेमियों ने गर्म समोसों, बर्फ़ी और गर्म चाय का आनंद लिया।

दूसरे दौर का आरम्भ श्री सतीश सेठी के काव्य पाठ से शुरू हुआ। उनकी रचना मातृत्व की महानता को व्यक्त करती पंक्तियाँ थीं “सृष्टि के सृजन से भी पहले मैं यहाँ हूँ”।  दूसर नम्बर पर रचना पाठ किया श्री निर्मल सिद्धू ने। उन्होंने अपनी मार्मिक लघुकथा “बीमा पॉलिसी बनाम हथकंडे” का पाठ किया, जिसे श्रोताओं ने बहुत पसन्द किया। श्रीमती सविता अग्रवाल के संस्मरण में माँ को याद करते हुए माँ के जाने की वास्तविकता को स्वीकार करने का भाव था। श्री अखिल भण्डारी की दूसरी ग़ज़ल भी तरही ग़ज़ल थी “रोज़ होता है तमाशा मेरे काशाने में”। सुमन कुमार घई ने अपनी नई कहानी “स्वीट डिश” का एक अंश सुनाया। नवम्बर मास की गोष्ठी की अंतिम रचना डॉ. नरेन्द्र ग्रोवर की “प्रश्न हैं कुछ” थी। कविता की पंक्ति “लहरों का यह सागर है या सागर लहर में है” बहुत प्रभावी थी।

कार्यक्रम के अंत में सुमन कुमार घई ने १८ नवम्बर को हिन्दी राइटार्स गिल्ड द्वारा किए जा रहे नाटक “उधार का सुख” की सूचना देते हुए सभी को आमंत्रित किया।

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