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कड़ाके की सर्दी और कविता की उष्णता

11 मार्च, 2017 – आज कड़ाके ठंड (-13 डिग्री सेंटीग्रेड) और तेज़ हवा (27 से 36 कि.मी.) भी हिन्दी साहित्यप्रेमियों को हिन्दी राइटर्स गिल्ड की मासिक गोष्ठी के लिए हतोत्साहित नहीं कर पाई। दोपहर के दो बजे जाने-पहचाने चेहरे और कई नवांगतुक ब्रैम्पटन लाइब्रेरी की चंग्कूज़ी शाखा के थियेटर रूम में इकट्ठे हुए। सभी लोगों के दिलों में होली के रंगों की तरंगें उठ रहीं हों तो गुलाल न हो ऐसा कैसे हो सकता है। हालाँकि होली का वार्षिक महोत्सव का आयोजन 25 मार्च को तय हुआ है, परन्तु गुलाल का सगुन तो होना ही था। सभी के गुलाल का टीका लगाया गया और मिठाइयों के साथ मुँह मीठा किया गया। भुवनेश्वरी जी पापड़ी चाट बना कर लाईं थीं और कुलदीप आह्लुवालिया "मैंगो फ़्रूट पुडिंग"! ओटमील कुकीज़, नमकीन और चाय की गर्माहट के साथ गोष्ठी आरम्भ हुई।

कार्यक्रम का आरम्भ कविता पाठ से हुआ। पहली कवयित्री थीं अमृतसर कैनेडा यात्रा पर आयीं डॉ. सुरिंदर जीत कौर। उन्होंने अपनी पंजाबी ग़ज़ल में "शीशे सांवें" (शीशे के सामने) में मानव के दोहरे चरित्र पर टिप्पणी की। सुरजीत कौर ने नारी विमर्श की पंजाबी कविता में नारी-पुरुष के सहपथिक होने के महत्व को शब्दों में ढाल कर गोष्ठी का ध्यान अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस (८ मार्च, २०१७) की ओर दिलाया। अगली कवयित्री लता पाण्डे ने दो कविताओं का पाठ किया, पहली थी "अस्तित्व", इस कविता में लता जी ने फूलों के बिम्ब के तुलनात्मक प्रयोग से मानव के अस्तित्व की बात की। क्योंकि उनकी कविताएँ प्रायः छोटी होती हैं, इसलिए उनसे एक और कविता पढ़ने का आग्रह किया गया और उन्होंने सुनाई। सुमन कुमार घई ने अपनी एक बहुत पुरानी कविता "शब्द-स्वर" सुनाई। उन्होंने इस कविता के बारे में बताया कि यह कविता उनकी एक अन्य कविता "मौन" की पूरक कविता है। "मौन" में उन्होंने मौन की तुलना ईश्वरीय गुणों से करते हुए शब्द को सीमित कहा था। "शब्द-स्वर" में शब्द की शिकायत थी कि "कवि तूने यह किया/मौन को तूने भगवान से मिलाया/और मुझे बिल्कुल भुला दिया?" इसके पश्चात भुवनेश्वरी पांडे ने अपनी एक जर्जर होती पुरानी डायरी में से उस समय की कविता "तुम चुपके से आ जाओ" सुनायी और उनकी दूसरी कविता "होली" थी। पंकज शर्मा ने बहुत ही प्रभावशाली कविता "बंधन मुक्त" सुनाई और उनकी दूसरी कविता थी, "तुम जा सकते हो"। अखिल भण्डारी ने दो उर्दू की रचनाएँ सुनायीं, पहली नज़्म "आज की रात" थी और दूसरी रचना ग़ज़ल थी, "सीधी सी लकीर पर चला जा रहा हूँ"। विजय विक्रान्त ने कविता से हटते हुए अपनी रचना "डायरी के पन्ने" का एक अंश सुनाया। यह अंश एक टैक्सी ड्राईवर के एक दिन का वृत्तान्त था – तीन अलग-अलग घटनाओं के बारे में; मानों तीन अलग-अलग लघुकथाएँ हों। शैलजा सक्सेना ने नारी दिवस के बारे में बोलते हुए टिप्पणी की कि नारी विमर्श नारी की पीड़ा की बात तो करता है परन्तु आज के समय में नारी की उपलब्धियों को अनदेखा करते हुए घिसी-पिटी बातों को दोहराता रहता है। उनकी पहली कविता का शीर्षक था "कुछ नहीं बीतता" और उन्होंने अपनी दूसरी अभी शीर्षकहीन कविता शुरू की – "आज छुपा दीं मैंने अपनी सारी कविताएँ जो स्त्रियों पर थीं" और अंतिम पंक्ति में कहा, "यह सब मेरा ही इकट्ठा किया सामान था… मुझे ही करना था इनका तर्पण!" दोनों कविताएँ इतनी प्रभावशाली थीं कि नारी विमर्श पर कुछ समय के लिए चर्चा आरम्भ हो गयी, जिसमें सभी लोगों ने भाग लिया। इसके पश्चात कविता का छूटा छोर फिर से सँभाला पूनम चन्द्रा "मनु" ने। उन्होंने कविता आरम्भ करते हुए कहा, "होली की बात हो और कृष्ण जी और गोपियों का ज़िक्र न हो… नहीं हो सकता।" अपनी कविता में उन्होंने कृष्ण-गोपियों में होली का दृश्य शब्दों में उकेरा। कुलदीप आह्लुवालिया ने कविता में कहा, "कहते हैं रोज़ मिलो" जो कि एक उत्कृष्ट रचना थी। उनकी दूसरी कविता नारी की दशा पर थी। डॉ. नरेन्द्र ग्रोवर जो पहली बार हिन्दी राइटर्स गिल्ड की गोष्ठी में किचनर (ओंटेरियो) से आए थे, ने अपनी दो रचनाओं का पाठ किया। दोनों रचनाओं को बहुत पसन्द किया गया और जम कर वाह-वाह हुई। राज महेश्वरी ने होली से संबंधित अपनी रचना सुनाई और डॉ. इन्दु रायज़ादा ने दो प्रसिद्ध कवियों की रचनाओं का पाठ किया। श्रीमती प्रमिला भार्गव ने होली पर अपनी कविता का पाठ किया।

इसके साथ ही कविताओं का दूसरा दौर आरम्भ हो गया। इसी दौरान डॉ. जगमोहन सांगा भी आ पहुँचे। उनसे काव्य-पाठ का आग्रह किया गया। उन्होंने झिझकते हुए कहा, "इतनी देर से पहुँचा हूँ तो मुझे कविता सुनाने का हक़ तो नहीं होना चाहिए।" पुनः आग्रह पर उन्होंने अपनी एक कविता ख़ामोश रहने के विषय पर सुनाई।

कार्यक्रम का अंत करते हुए डॉ. नरेन्द्र ग्रोवर से एक और कविता सुनाने की गुज़ारिश की गयी और उन्होंने बहुत शौक़ से अपनी एक ग़ज़ल सुनाई। आज की गोष्ठी बहुत ही सफल रही। हालाँकि कड़ाके की सर्दी ने बहुत से कवियों और श्रोताओं को रोक तो लिया परन्तु काव्य धारा को नहीं रोक पायी।

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