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नव वर्ष की पहली गोष्ठी- नवीन योजनायें; नवीन संभावनायें (जनवरी १४, २०१७)

जनवरी १४, २०१७ को हिन्दी राइटर्स गिल्ड की नये वर्ष की पहली गोष्ठी हुई। इस गोष्ठी का प्रारंभ नये वर्ष, विश्व हिन्दी दिवस, संक्रांति और लोहड़ी की शुभकामनाओं के साथ हुआ। इसके बाद "नये वर्ष की लेखकीय संभावनाओं" पर चर्चा की गई।

गोष्ठी का प्रारंभ करते हुये डॉ. शैलजा सक्सेना ने संक्राति पर श्री विजय बागरी जी का गीत सुनाया,

"एक अभिनव प्रीति का / संक्राति का क्षण है"

इस के बाद नये वर्ष की लेखकीय संभावनाओं पर चर्चा प्रारंभ हुई। श्री सुमन कुमार घई ने कहा कि इस नए वर्ष में अपने लेखन के स्तर को बेहतर करना चाहिये क्योंकि चाहें हम अधिक लिख रहे हों पर विश्व के अन्य लेखकों के बीच हमारा स्तर अभी भी उतनी सराहनीय नहीं है अत: हमें अपने स्तर पर काम करना चाहिये। श्री अखिल भंडारी ने तीन सलाहें दी कि

  1. संस्था को इस वर्ष एक कविता संग्रह और एक कहानी संग्रह प्रकाशित करना चाहिये।
  2. लोगों को समय पर आना चाहिये ताकि कार्यक्रम समय पर शुरू हो सके।
  3. गोष्ठी में विषय दे कर चर्चा होनी चाहिये ताकि लोग तैयारी कर के आयें।

डॉ. शैलजा सक्सेना ने कहा कि पहले भी संकलनों को निकालने का सोचा गया था परन्तु चयन की समस्या आती है। जिसकी रचना को भी स्तर के कारण स्वीकार नहीं किया जायेगा, उसे ही निराशा होगी और सब को साथ रखने से संग्रह के स्तर पर प्रश्न उठेगा! श्री सुरेश पांडेय ने सुझाया कि संकलन के तीन हिस्से हों जिनमें एक प्रतिष्ठित-प्रकाशित रचनाकारों के लिये, एक उदीयमान रचनाकारों के लिये और एक नवोदित लेखकों के लिये हो ताकि सभी को छपने की प्रसन्नता और प्रोत्साहन मिल सके। कमांडर संजीव अग्रवाल ने सलाह दी कि यह संग्रह हिन्दी दिवस के अवसर पर १४ सितम्बर को प्रकाशित किया जाये। श्री विजय विक्रांत ने कहा कि प्रकाशन का समय जो भी हो पर काम अधिक होने से यह काम बहुत पहले से और योजनाबद्ध तरीके से करना होगा। श्रीमती प्रमिला भार्गव की सलाह थी कि संस्था को अपने उद्देश्य के अनुरूप हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने हेतु सभी लेखकों को स्थान दे कर प्रोत्साहन देना चाहिये, रचना को शुद्ध भाषा के स्तर पर न नापा जाये और गल्तियाँ करने वाले लेखक को नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिये, इस तरह समीक्षा आलोचना होने से बच सकती है। श्री सुमन कुमार घई और डॉ. शैलजा सक्सेना का मत था कि स्तर की रक्षा की ज़िम्मेदारी लेखक की भी है अत: लिखने के लिये पढ़ना बहुत ज़रूरी है। सभी लेखको से और अधिक पढ़ने के लिये कहा गया। इसी संदर्भ में "पुस्तक बाज़ार" और उस पर प्रकाशित श्री सुमन कुमार घई के कहानी संग्रह "लाश और अन्य कहानियाँ" की भी डॉ. शैलजा सक्सेना ने प्रशंसा की। श्री पंकज शर्मा ने कहा कि लेखक की रचना का स्तर अपनी भावनाओं को ईमानदारी से लिखने में है। उनका मत था कि संग्रह की गुणवत्ता के साथ समझौता नहीं किया जाना चाहिये। अच्छी रचनाओं का प्रकाशन और कम अच्छी रचनाओं को मार्गदर्शन देने से स्तर की रक्षा की जा सकती है। श्री निर्मल सिद्दू ने इस बात का समर्थन करते हुये कहा कि संकलन छपना चाहिये और पैनल बोर्ड निर्णय ले और साथ ही मार्गदर्शन भी करे। उन्होंने यह भी कहा कि अच्छी किताबों को आपस में लेना-देना चाहिये ताकि सभी को उनके बारे में पता लग सके। दर्शकों में श्रीमती गुरमेल सिद्धू और श्रीमती माया पांडेय ने कहा कि कवियों की रचनाओं को सुनने का आनंद अधिक से अधिक मिलता रहना चाहिये। डॉ. शैलजा सक्सेना ने कहा कि संस्था की भी सभी सदस्यों से यह अपेक्षा है कि वे गोष्ठियों और कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी लें और कुछ दायित्व उठायें ताकि काम तेज़ी से चल सके। 

गोष्ठी में सभी ने सकारात्मक सुझाव दिये और यह तय रहा कि:

  1. सदस्य लायब्रेरी से किताब इशु करायेंगे और पढ़ेंगे।
  2. समय पर आयेंगे।
  3. शुरू के दस मिनट पढ़ी हुई किताबों की चर्चा होगी। किताबों का आदान-प्रदान भी होगा।
  4. संग्रह की रूपरेखा पर विचार किया जायेगा।

अगली गोष्ठी के लिये विषय निर्धारित कर लिया गया: "लेखन में भाषा और संवेदना"

इसके बाद दूसरे सत्र में कविता-पाठ हुआ जिसमें सभी लेखकों ने अपनी दो-दो कवितायें सुनाईं। भूपेन्द्र जी ने हास्य-व्यंग्य की रचना से यह सत्र प्रारंभ किया। फिर पंकज जी ने अपनी दो ग़ज़लें पढ़ी, "कुछ उजाले ज़िंदगी के अँधेरों को और भी गहरा कर देते हैं", निर्मल जी ने नव वर्ष और लोहड़ी से जुड़े कुछ स्वरचित हाइकू सुनाये और फेसबुक पर प्रसिद्ध मायामृग जी की एक कविता सुनाई। सुमन जी ने दो नई रचनायें सुनाई "चीखती दरारें", "किनारा", भुवनेश्वरी जी ने कुछ हाइकू और एक उदात्त प्रेम की कविता सुनाई। सविता जी एक कविता "गूँज" शीर्षक से और एक कविता "विश्व हिन्दी दिवस" के अवसर पर "हिन्दी से मेरी बात" सुनाई। प्रमिला जी ने नव वर्ष पर लिखी अपनी रचना सुनाई तो शैलजा जी ने एकांत पर लिखे तीन मुक्तकों के बाद "स्त्री का महाकाव्य" कविता सुनाई। अंत में अखिल जी ने अपनी दो गज़लें सुनाईं, "दिल है मेरा जंगल सा.."!

इन कविताओं को सभी ने पसंद किया। इस बार का जलपान श्री सुमन कुमार घई ने आयोजित किया था। लोगों ने उनके लाये समोसे, बेसन-बर्फी और रेवड़ियाँ शौक से खाईं। भुवनेश्वरी पांडेय जी की मटर और गुरमेल सिद्दू जी की रेवड़ियाँ भी लोगों ने स्नेह से खाईं। कार्यक्रम बहुत अच्छी तरह संपन्न हुआ।

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