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तिरंगे के सम्मान में तीन विधाएँ

अगस्त ११, २०१८ - हिन्दी राइटर्स गिल्ड की मासिक गोष्ठी अगस्त ११ को सफलतापूर्वक संपन्न हुई। यह गोष्ठी विशेष थी क्योंकि यह गोष्ठी “तिरंगे के सम्मान में तीन विधायें”; “लघुकथा का गुरु प्रभाव”, “गीत-संगीत” और ”कविता और लघुकथा पाठ” की प्रस्तुति थी। गोष्ठी के प्रारंभ होने से पहले लोगों ने स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें देते हुये चाय-जलपान का आनंद उठाया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में डॉ.शैलजा सक्सेना ने सबका स्वागत करते हुए गोष्ठी के संचालक डॉ. नरेन्द्र ग्रोवर का परिचय दिया। डॉ. ग्रोवर डॉक्टर होने के साथ-साथ आनंद मुसाफ़िर के नाम से रचनायें करते हैं और रेडियो पर एक कार्यक्रम भी नियमित रूप से प्रस्तुत करते हैं। पहले सत्र “लघुकथा का गुरु प्रभाव” के मुख्य अतिथि श्री रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’ का परिचय देते हुए बताया कि ’हिमांशु’ जी ने २२ पुस्तकें लिखी हैं और ३२ पुस्तकों का संपादन किया है। वे तीन वेब पत्रिकाओं ’लघुकथा.कॉम’, ’त्रिवेणी’ और ’हिन्दी हाइकू.नेट’ के संपादक/सह-संपादक भी हैं। लघुकथा की समालोचना पर उनकी एक बहुत उपयोगी पुस्तक “लघुकथा का वर्तमान परिदृश्य” हाल ही में आई है।

’हिमांशु’ जी ने लघुकथा के स्वरूप पर बात करते हुये कहा कि आजकल नये स्वर आ रहे हैं जो बदलते समय और ज़मीन से जुड़े हैं और नये तेवर में अपनी बात कह रहे हैं। उन्होंने सुकेश साहनी की “स्कूल”, सत्यकीर्ति शुक्ला की “रक्षक”, डॉ. छवि निगम की “खिड़की” और महेश शर्मा की “नेटवर्क” लघुकथाओं के पाठ और व्याख्या द्वारा अपनी बात को स्पष्ट किया। लघुकथा में शीर्षक, भाषा और शिल्प के अंतर्गत कथ्य के क्रम की महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि “शीर्षक कथा के मर्म को पकड़ने वाला और पाठकों की उत्सुकता जगाने वाला होना चाहिये। भाषा पात्रानुकूल तो होती ही है पर उसे पात्र की मनोदशा के अनुरूप बदलना भी होता है अन्यथा वह प्रभावशाली नहीं होगी। पत्थर हरेक के हाथ में होता है पर मूर्ति हर कोई नहीं बना पाता, यह व्यक्ति के कला-कौशल पर निर्भर करता है कि वह पत्थर को कितना तराश सकता है। शिल्प में वाक्यों के क्रम को ऊपर-नीचे करने से कथा का प्रभाव कम या अधिक हो सकता है” यह कहते हुये उन्होंने डॉ. कविता भट्ट की लघुकथा “कुलच्छन” का उदाहरण दिया, जिसमें पहले पंडित जी के कुलक्षण उनके व्यवहार से दिखाई देते हैं फिर अंत में अपने कथनी और करनी की विपरीतता का चरम वह अपनी पत्नी को कुलच्छनी कह कर करते हैं। ’हिमांशु’ जी ने बताया कि इस कहानी में लेखिका ने जिस प्रकार घटना क्रम संजोया है, उससे कहानी मर्मस्पर्शी बन गई है।

दूसरे सत्र में भारत से आये श्री के.एल.पांडेय जी ने अपनी साहित्य और संगीत विवेचन की यात्रा का परिचय देते हुये बताया कि उन्होंने ग्यारह वर्षों की मेहनत से तीन खंडों का “हिन्दी सिने राग एनसाइक्लोपीडिया” बनाया है। इसमें उन्होंने ५७०० फिल्मों, लगभग १७००० गानों के अध्ययन और विवेचन के बाद उन्हें १७४ रागों में वर्गीकृत किया है। उनके इस महती काम का विमोचन सिने संगीतकार आनंद जी ने किया और इसके लिये उन्हें “दिनकर केलकर स्मृति, पुणे” संस्था से २०१४ का “छंद भेद” पुरस्कार श्री नाना पाटेकर के हाथों मिला। पांडेय जी के दो लघुकथा संग्रह (मनके, तिनके), तीन कविता संग्रह (बाँसुरी, धारा रंगों से भरी, भीगी हवायें), एक व्यंग्य संग्रह (प्रपंचीलाल की आत्मा) तथा संगीत व्याकरण पर “सुर संवादिनी” पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

यह हिन्दी राइटर्स गिल्ड का सौभाग्य था कि उन्हें अप्रत्याशित रूप से भारत से आई प्रसिद्ध कहानीकार, आलोचक और स्त्री-विमर्श की चिन्तक डॉ. रोहिणी अग्रवाल का साथ इस गोष्ठी में मिला। वे हरियाणा के महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं और हरियाणा साहित्य अकादमी पुरस्कार के साथ-साथ कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं। उन्होंने आलोचना की कई पुस्तकें लिखीं हैं साथ ही उनके दो कहानी संग्रह, ”घने बरगद तले”और “आओ माँ हम परी हो जायें” भी प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. रोहिणी अग्रवाल ने विदेशी भूमि पर हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़े लोगों के बीच अपनी उपस्थिति को परिवार में होने जैसी अनुभूति बताते हुए कहा कि यहाँ उन्हें “वसुधैव कुटुंबकम” सत्य होता हुआ दिखाई दे रहा है। उन्होंने चुटकुलों में स्त्रियों पर व्यंग्य की बहुलता पर बात करते हुए कहा कि पितृसत्ता की व्यवस्था और पुरुष की मानसिकता बदलने से ही असली बदलाव आयेगा। हाल ही में देखी अंग्रेज़ी फ़िल्म “द शेप ऑफ़ वाटर” की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इस फ़िल्म के केन्द्र में दलित वर्ग की, उपेक्षित गूँगी स्त्री है और अतिमानवीय नायक (आधा पुरुष,आधा जलपरी) है यानी हाशिये पर पड़े लोग और फ़ंतासी कहानियों का नायक है। फ़िल्म के अंत में नायक उस स्त्री को भी उसकी सहमति से जलपरी बना कर अपने साथ ले जाता है। रोहिणी जी ने यहाँ फ़िल्म में दिखाये इस दृश्य की विवेचना करते हुए उस सामाजिक विसंगति की ओर ध्यान दिलाया जहाँ कमज़ोर, निर्धन और विकलांगों को समानता और प्रेम के लिए अतिमानवीय चरित्रों की आवश्यकता पड़ रही है।

अंतिम भाग में सदस्यों द्वारा कविता और लघुकथा पाठ हुआ। लघुकथा पढ़ने वाले थे: भुवनेश्वरी पांडे, उनकी लघुकथा “शस्त्र-नियंत्रण” का आधार टोरोंटो में बढ़ती हिंसा थी, कृष्णा वर्मा ने जाति को रोटी से जोड़ते हुए “ईंटें” पढ़ी, सुमन घई ने स्त्री और पुरुष के बीच टूटते संवाद को चिड़िया की दो प्रजातियों से जोड़ते हुए “प्रजाति” पढ़ी, डॉ. हंसा दीप ने दो लघुकथायें, “बुद्धिजीवी”, जिसमें बस में खड़ी वृद्धा को देख सीट देने की सोचने पर भी कुछ न करने वाले चरित्र के माध्यम से बुद्धिजीवियों पर व्यंग्य था और “भूख” में केवल संवादों के द्वारा दिखाया गया था कि निर्धनता की चरम सीमा में स्त्री का बिकना ही भूख की शांति का उपाय रह गया है। अंत में बच्चे का माँ से कहना “तो माँ जल्दी से बिक जाओ न!” ने करुणा और पीड़ा को घनीभूत कर दिया। राज माहेश्वरी ने एक संस्मरण पढ़ा जिसमें दोस्त द्वारा कटु सत्य को स्वीकार कर जीवन बदलने की कहानी थी। कविताओं में, श्री भगवत शरण श्रीवास्तव ने “पहले मिलन की याद”, आशा बर्मन ने “सेलफोन”, डॉ. शैलजा सक्सेना ने “स्त्री कविता क्या है?”, अखिल भंडारी ने ग़ज़ल, डॉ. रत्नाकर नराले ने एक संस्कृत गीत पढ़े। बरार जी ने नीरज जी को श्रृद्धांजलि देते हुए “स्वप्न झरे फूल से” गाया और रिंटू जी ने एक मधुर रचना से कार्यक्रम का अंत किया। इस कार्यक्रम में धर्मपाल जैन जी द्वारा प्रस्तुत व्यंग्य रचना ”साहित्य की रेसिपी” ने सबका मन मोह लिया। इस रचना में साहित्यकारों को रचना जलेबी के समान सरस बनाने की सीख और पाठकों द्वारा अच्छे साहित्य तक को समोसे की प्लेट बनाने पर व्यंग्य करते हुए आज के समय में साहित्य, साहित्यकार और पाठक का संबंध दिखाया गया है। इस कार्यक्रम में हिन्दी प्रेमी और हिन्दी साहित्य-सभा के भूतपूर्व-अध्यक्ष श्री कैलाश भटनागर ने मुख्य अतिथियों और कुछ कवियों को माला पहना कर अपना स्नेह और आशीर्वाद दिया।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. शैलजा सक्सेना ने संचालक को धन्यवाद देते हुये सितम्बर ९ को होने वाले गिल्ड के वार्षिक कार्यक्रम की सूचना और आमंत्रण सभी को दिया। पूरा कार्यक्रम आत्मीय वातावरण में संपन्न हुआ।

’हिमांशु’ जी द्वारा प्रस्तुत कहानियों के लिंक नीचे दिये जा रहे हैं:

स्कूल

सुकेश साहनी

https://www.youtube.com/watch?v=6IRbJ-qap0w

खिड़की

डॉ. छवि निगम

http://laghukatha.com/2018/05/01/खिड़की/
 

कुलच्छन

डॉ. कविता भट्ट