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२०१८ की अंतिम मासिक गोष्ठी

वर्ष 2018 की अंतिम गोष्ठी

दिसम्बर 08, 2018 -  आज हिन्दी राइटर्स गिल्ड ने वर्ष २०१८ की अंतिम गोष्ठी का आयोजन ब्रैमप्टन लाइब्रेरी की स्प्रिंगडेल शाखा के सभागार में किया। कार्यक्रम का आरम्भ अल्पाहार और गर्म चाय के साथ हुआ। आज के कार्यक्रम में भारत से आए दो लेखक भी पधारे थे। दिल्ली से आईं श्रीमती कुसुम पालीवाल और जयपुर से पधारे श्री शैलेन्द्र चौहान ने आज की गोष्ठी में भाग लिया। आज के कार्यक्रम का संचालन किया डॉ. शैलजा सक्सेना ने।

कार्यक्रम का आरम्भ गरम चाय, समोसों और गाजर के हलवे की बर्फी के साथ हुआ। इसका प्रबन्ध श्री संजीव अग्रवाल और श्रीमती सविता अग्रवाल की ओर से अपनी वैवाहिक वर्षगांठ की ख़ुशी में किया गया था। डॉ.. शैलजा सक्सेना ने सभी उपस्थित लोगों का स्वागत करते हुए अग्रवाल दंपती को बधाई देते हुए सब की ओर से शुभकामनाएँ प्रस्तुत कीं और कुसुम पालीवाल जी और शैलेन्द्र चौहान जी का संक्षिप्त परिचय दिया और श्रोताओं को सूचित किया कि २०१८ का वर्ष हिन्दी राइटर्स गिल्ड के लिए कई उपलब्धियों का वर्ष रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आने वाला वर्ष इस वर्ष की तुलना में और भी अधिक सरगर्मियों से भरा होगा।

सबसे पहले उन्होंने कुसुम पालीवाल जी को आमंत्रित किया कि वह अपना परिचय देते हुए कुछ रचनाओं का पाठ करें। कुसुम जी ने बताया कि उनका अधिकतर रचना-कर्म भारत में नारी के जीवन को प्रतिबिम्बित करता है। उन्होंने तीन कविताएँ सुनाईं। पहली रचना “ओ पुरुष” पुरुष को ही संबोधित करते हुए थी; जिसका भाव था कि नारी के बिना पुरुष शक्तिहीन है परन्तु वह नारी को अबला की संज्ञा से संबोधित करता है। दूसरी रचना “कैनवास” में वास्तव में एक भारतीय नारी के दैनिक जीवन का कैनवास ही उभर कर श्रोताओं के समक्ष आया। तीसरी रचना “तुमको अगर जाना ही था” सिद्धार्थ की पत्नी यशोधरा के उलाहने की अभिव्यक्ति थी, जैसा कि कविता के शीर्षक से ही ज्ञात होता है। अपनी रचना प्रस्तुति के अंत पर उन्होंने अपनी तीन पुस्तकें हिन्दी राइटर्स गिल्ड को उपहार स्वरूप भेंट कीं और हिन्दी राइटर्स गिल्ड की ओर से विजय विक्रान्त जी, जो गिल्ड के संस्थापक निदेशकों में से एक हैं, ने कुसुम पालीवाल जी को एक पेन भेंट किया।

काव्य पाठ करने वाले अगले कवि शैलेन्द्र चौहान थे। अपना परिचय देते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने लिखना बहुत पहले आरम्भ किया। वह कविता, कहानी, आलेख और आलोचना लिखते हैं। उनके चार काव्य संकलन - “नौ रुपये बीस पैसे के लिए”, “श्‍वेतपत्र”, “और कितने प्रकाश वर्ष”, “ईश्वर की चौखट पर” हैं। उनके लिखे एक कहानी संग्रह का नाम "नहीं यह कोई कहानी नहीं" है। उनकी एक पुस्तक “आलोचना का अतिक्रमण” आलोचना विधा पर प्रकाशित हो चुकी है। शैलेन्द्र जी की पहली कविता “चिड़िया और कवि” कविता में कवियों पर आरोप था कि वह वास्तविकता से जुड़े बिना रचना करते हैं “जब होते हैं हम कवि/तब आदमी नहीं होते/जब करते हैं बात/कलुआ, रमुआ, सुखिया, होरी की/कोरी, चमार और अघोरी की/तब हम बहुत दूर होते हैं/उन स्थितियों, परिस्थितियों एवं/संस्थितियों से" दूसरी कविता “मेरे गाँव का आदमी” ग्रामीण जीवन की वास्तविकता का कच्चा चिट्ठा था। तीसरी कविता “अस्मिता” में व्यक्तिगत/घर की पीड़ा/कुंठा की अभिव्यक्ति थी। शैलेन्द्र जी को रचना पाठ के पश्चात हिन्दी राइटर्स गिल्ड की ओर से विजय विक्रान्त जी ने एक पेन भेंट किया।

अगली कवयित्री पंजाबी की लेखिका सुरजीत कौर जी थीं। उन्होंने अपनी पंजाबी की कविता के हिन्दी अनुवाद “हे सखी” का पाठ किया। श्री इकबाल बरार ने एक फ़िल्मी ग़ज़ल “इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा न हुआ” अपनी सुरीली आवाज़ में सुनाई। अखिल भण्डारी जी ने अपनी ग़ज़ल “जहां में एक तमाशा हो गए हैं/ हमें होना था क्या क्या हो गए हैं” का पाठ किया। श्री सतीश सेठी कविता “इन्तज़ार” में तीन पीढ़ियों के पारस्परिक इंतज़ार की व्यथा थी। श्री बालकृष्ण शर्मा की कविता “ढूँढ़ सके तो ढूँढ़ ले प्राणी” आध्यात्मिक खोज की लालसा से संबंधित थी। श्री निर्मल सिद्धू ने अपनी चिर-परिचित शैली में एक तरही ग़ज़ल “अपने रिश्तों का एहतराम करें” का पाठ किया। विद्या भूषण धर ने अपनी रचना सुनाने की बजाय, श्री अग्नि शेखर की कविता “गिरती बर्फ़ में” सुनाई। श्री विजय विक्रान्त ने अपनी शृंखला “डायरी के पन्ने” में एक और पन्ना जोड़ा “जॉगिंग का पन्ना”। डॉ. नरेन्द्र ग्रोवर ने अपनी कविता “तुझे नाम क्या दूँ ज़िन्दगी” का पाठ किया। इसके पश्चात राज महेश्वरी जी ने कोई रचना सुनाने की बजाय १८ नवम्बर को हिन्दी राइटर्स गिल्ड द्वारा मंचित नाटक “उधार का सुख” के बारे में अपने मित्रों की टिप्पणियों को सबके साथ साझा किया, जिससे सभी का मनोबल बढ़ा। श्रीमती भुवनेश्वरी पांडे की कविता का शीर्षक था “संबंध” और आरम्भिक पंक्तियाँ थीं “वह आसमान सा छाया रहा/वह कली सी खिलती रही”। श्रीमती इंदिरा वर्मा ने “पुनिया की माँ” एक मार्मिक संस्मरण सुनाया। श्रीमती लता पाण्डे की एक छोटी की कविता “अभी क्या” उन्हीं से स्वर में सुनी। श्रीमती पूनम चन्द्रा “मनु” की कविता की पंक्तियाँ थीं “आओ समंदर पर/उसी की बूँदें लेकर/लहरों की लिखाई सी/कोई नज़्म लिखें”। श्रीमती कृष्णा वर्मा ने अपना काव्य पाठ एक हाईकु से किया और उनकी कविता थी “पीड़ा के पुल”। उन्होंने एक लघुकथा भी सुनाई “पेड़ का दुख” जिसमें वह पर्यावरण की समस्या ओर ध्यान दिलाते हुए राजनैतिक उच्छृंखलता पर एक करारा व्यंग्य भी कर गईं। श्रीमती सविता अग्रवाल “सवि” ने एक छोटी कहानी “एक पड़ाव यह भी” सुनाई। श्री संजीव अग्रवाल ने  अपनी एक “आपबीती” सुनाते हुए ध्यान दिलाया कि भारतीयों कि तुलना में पश्चिमी देशों के व्यक्ति कितने अधिक शिष्ट होते हैं। संजीव जी के बाद सुमन कुमार घई ने अपनी एक बहुत पुरानी कविता “मौन” सुनाई। अपनी रचना पाठ के पश्चात सुमन कुमार घई ने आज की साहित्यिक गोष्ठी की संचालिका डॉ. शैलजा सक्सेना को रचना पाठ के लिए आमन्त्रित किया। डॉ. शैलजा सक्सेना ने अपना एक पुराना लघु आलेख “अमृता प्रीतम: एक श्रद्धांजलि” का पाठ किया।

एक ग्रुप फोटो के साथ की इस वर्ष की अंतिम गोष्ठी का अंत हुआ।