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हिन्दी राइटर्स गिल्ड की मासिक गोष्ठी सितम्बर 09, 2017

ब्रैमप्टन - सितम्बर ०९, २०१७ - आज शनिवार को हिन्दी राइटर्स गिल्ड की मासिक गोष्ठी बहुत उत्साहपूर्ण रही। अगस्त मास की गोष्ठी में चर्चा का विषय था "देशप्रेम का स्वरूप: स्वतंत्रता से पहले; स्वतंत्रता के बाद" और यह वृहद चर्चा पूरी नहीं हो सकी थी। इसलिए यह चर्चा सितम्बर महीने की मासिक गोष्ठी में जारी रही।

ब्रैमप्टन की चिंग्कूज़ी शाखा के नए प्रोग्राम रूम में हिन्दी राइटर्स गिल्ड  के सदस्य एकत्रित हुए। सदा की तरह कार्यक्रम शुरू होने से पहले जलपान की व्यव्स्था थी और इस बार श्री सुरेश पांडे जी ने यह प्रबंध किया। कार्यक्रम का आरम्भ करते हुए डॉ. शैलजा सक्सेना ने कुछ घोषणाएँ कीं। उन्होंने बताया कि एकल विद्यालय फ़ाउंडेशन कैनेडा ने अपने १ अक्तूबर, २०१७ को होने वाले फ़ंड रेज़िंग कार्यक्रम में हिन्दी राइटर्स गिल्ड को सहयोग के लिए आमन्त्रित किया है। हिन्दी राइटर्स गिल्ड "चीफ़ की दावत" (कहानी लेखक भीष्म साहनी) नाटक प्रस्तुत करेगी। कार्यक्रम के संयोजकों ने हिरागी के चार कवियों को भी काव्य पाठ के लिए आमन्त्रित किया है। एकल विद्यालय फ़ाउंडेशन १७ सितम्बर को फ़ंडरेज़िंग गोल्फ़ टूरनामेंट का भी आयोजन कर रहा है।

डॉ. शैलजा सक्सेना ने चर्चा की भूमिका में प्रश्न किया कि क्या भारत का लेखक आज के भारत की सही तस्वीर अपने लेखन में प्रस्तुत कर रहा है? या फिर प्रगति को दरकिनार करके केवल "रोने-धोने" वाला साहित्य ही रच रहा है। क्या लेखक का दायित्व केवल समाज का प्रतिबिम्ब ही होना है या इससे आगे बढ़ कर अपने नये विचारों को प्रस्तुत करना भी है।

प्रथम वक्ता सुमन कुमार घई ने डॉ. सुरंगमा यादव की शोध-पुस्तक "वंशीधर शुक्ल का काव्य" के अंशों द्वारा उदाहरण देते हुए कहा कि कवि अगर विदेशी सरकार द्वारा किए जा रहे अन्याय के विरोध में स्वर उठाता है तो स्वतंत्रता के पश्चात भ्रष्ट सरकारी तंत्र के विरोध में भी उतने ही रोष से तड़प उठता है जितना कि विदेशी सरकार के प्रति। उन्होंने वंशीधर शुक्ल की कई कविताओं के अंश भी पढ़े।

तत्पश्चात गिल्ड की गोष्ठी में पधारे दिलीपन सुन्दरण, जो एक वेबडिज़ाइन कंपनी के मालिक हैं, ने baharatmarg.com के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि यह वेबसाइट भारत के खोये हुए इतिहास को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से आरम्भ की है। उन्होंने चिन्ता व्यक्त कि भारत में युवा वर्ग चाहे वह किसी भी भाषा वर्ग से संबंधित हो, केवल अंग्रेज़ी के सिवाय किसी भाषा की लिपि में लिखने में असमर्थ होता जा रहा है।

अगली वक्ता डॉ. इंदु रायज़ादा थीं, उन्होंने विषय से कुछ हट कर केवल स्वतंत्रता के बाद भारत के प्रजातंत्र की उपलब्धियों की ही बात की।

इस सत्र का अन्त करते हुए डॉ. शैलजा सक्सेना ने कहा कि साहित्य सृजन में आदर्शवाद और यथार्थवाद में संतुलन होना चाहिए। शैलजा जी ने श्रोताओं को प्रश्नोत्तर के लिए आमन्त्रित किया तो श्री विद्याभूषण धर ने घटती हुई देशभक्ति के प्रति चिंता व्यक्त की और इसलिए बहुत हद तक पाठ्यक्रम पढ़ाये जा रहे ग़लत इतिहास को दोषी ठहराया।

समय  की सीमा को ध्यान में रखते हुए इस चर्चा को यहीं समाप्त कर दिया गया। और डॉ. शैलजा सक्सेना ने काव्य पाठ का सत्र आरम्भ किया।

सबसे पहले कवि किचनर (ओंटेरियो) से पधारे कवि डॉ. नरेन्द्र ग्रोवर ने अपनी कविता "हर सुबह एक दिया जला लेता हूँ" सुनायी। श्री अनिल कुंदरा ने अभिनव शुक्ल की रचना "आग बहुत-सी बाकी है" सुनायी। अगली कवयित्री श्रीमती कृष्णा वर्मा ने अपनी प्रभावशाली कवित "डर" में आयु के साथ बदलते हुए डर के स्वरूपों को व्यक्त किया। न्यू मार्केट (ओंटेरियो) से आईं श्रीमती स्नेह सिंघवी ने प्रेमरस से ओतप्रोत कविता का पाठ किया। श्रीमती इंदिरा वर्मा जी कविता "वह पेड़" श्रोताओं ने बहुत पसंद की। इस कविता में एक वृद्ध पेड़ द्वारा चिंताग्रस्त मानव को शिक्षा की अभिव्यक्ति थी। श्रीमती पूनमचन्द्रा "मनु" में अपनी रोचक शैली में अपनी रचना "अच्छा लगता है" में स्त्री-पुरुष के संबंधों के प्रति भाव प्रस्तुत किये। श्रीमती कैलाश महन्त ने अपनी कविता में "कैनेडा" के प्रति नवांगतुकों की कृतज्ञता को प्रकट किया। श्रीमती प्रमिला भार्गव ने स्व. अमृता प्रीतम की कविता सुनाई। श्री अखिल भण्डारी ने अपनी ग़ज़ल "दरीचा था न दरवाज़ा था कोई" का पाठ किया। श्रीमती आशा बर्मन ने गिरीश जौहरी की कविता "द्वापर की बात और थी" हास्य कविता सुनाई। श्री इकबाल बरार ने "गाँठ लग जाए तो" ग़ज़ल का गायन किया। श्री राज महेश्वरी जी ने कविता "खोखली नीति" द्वारा अपना राजनैतिक असंतोष व्यक्त किया। श्री विद्याभूषण धर ने अटल बिहारी वाजपेयी की कविता "आज़ादी अभी अधूरी है" का पाठ किया। श्री निर्मल सिद्धु ने अपनी ग़ज़ल सुनायी और आचार्य संदीप त्यागी ने अपनी ग़ज़ल "किसकी किससे बात हुई" सुनाई। श्रीमती सुरजीत कौर ने अपनी पंजाबी की कविता सुनाई। अंत में श्री गोपाल बघेल ने अपनी अध्यामिक कविता का अपनी शैली में गायन किया।

कार्यक्रम शाम के पाँच बजे समाप्त हुआ।