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श्री ताहिर असलम गोरा के उपन्यास-रंगमहल- का लोकार्पण और महाप्राण निराला की जन्म-जयंती

१० फ़रवरी २०१८ हिंदी रायटर्स गिल्ड की मासिक गोष्ठी की रिपोर्ट

हिन्दी राइटर्स गिल्ड के लिये यह सम्मान की बात थी कि १० फरवरी २०१८ की गोष्ठी में TAG T.V. के मालिक/ संचालक, प्रसिद्ध पत्रकार श्री ताहिर असलम गोरा जी के मूल उर्दू उपन्यास के हिन्दी रूपांतरण “रंग महल” (अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद, भारत) का लोकार्पण किया गया। सर्वप्रथम डॉ. शैलजा सक्सेना (सह-संस्थापक निदेशिका हिंदी रायटर्स गिल्ड) ने संचालन करते हुए सभी का स्वागत किया और ठंडे मौसम में गर्म चाय-कॉफ़ी, समोसे, बर्फ़ी, मट्ठरी और गज़क के लिए सभी को आमंत्रित किया। जलपान की व्यवस्था श्री ताहिर जी, सुमन कुमार घई और पूनम चंद्रा ’मनु’ द्वारा की गयी। सभी ने जलपान का भरपूर आनंद उठाया। इसके उपरान्त गोष्ठी प्रारम्भ हुई।

श्री ताहिर असलम गोरा जी को उनके उपन्यास “रंग महल” के लिए  बधाई देते हुए और इस उपन्यास को अनेक प्रकार की चर्चायें शुरू करने वाला उपन्यास बताते हुये डॉ. शैलजा सक्सेना ने उन्हें मंच पर इस उपन्यास के कुछ अंश पढकर सुनाने के लिये आमंत्रित किया। ताहिर जी ने धन्यवाद देते हुए हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं को हिंदुस्तान की भाषाएँ बताया और  पुस्तक के सफ़र पर रौशनी डाली। उन्होंने बताया कि उपन्यास का उर्दू संस्करण पाकिस्तान से प्रकाशित हुआ है और पसंद भी किया गया पर कुछ समय में ही प्रकाशक के पास धमकियाँ आईं कि वे इस उपन्यास को दुकान से हटा लें। ऐसा होने के बाद ताहिर जी  ने इसके हिन्दी अनुवाद के विषय में सोचा और इस काम में मानोशी जी की सहायता ली। उन्होंने उपन्यास से अपने पसंद के  अंशों की प्रस्तुति की। इन अंशों में मुख्य चरित्र कभी कनाडा की सड़कों पर घूमता हुआ इस देश के वातावरण का विश्लेषण करता है तो कभी पाकिस्तान में अपने घर के आसपास की गलियों, चौराहों और खुश्बुओं में खो जाता है। एक अन्य अंश में उपन्यास का मुख्य पात्र शहज़ाद लोकतंत्र की परिभाषा को स्पष्ट करता हुआ दिखाई देता है। अंत में ताहिर जी ने कहा कि अब उन्हें दोनों मुल्क एक मुट्ठी में सिमटते हुए लगते हैं। 

ताहिर जी के वक्तव्य के पश्चात श्रीमती मानोशी चटर्जी ने पुस्तक पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की और कहा कि यह एक धीरज और निर्भीकता से लिखा गया  उपन्यास है और पाठक बहुत सी घटनाओं से अपने आप को जोड़ पाता है। उन्होंने उपन्यास में “इमेजिरी” का विश्लेषण करते हुए और कई उदाहरण देते हुये कहा कि अनेक चित्र पाठकों को अपने नये उपमानों से बाँध लेते हैं। विश्लेषण की तकनीकियों के बारे में बताते हुये मानोशी जी ने कहा कि वे स्कूल में बच्चों को उपन्यास समझने के लिये ”विजुलाइज़ेशन”,”मेकिंग कनैक्शंस” और “आस्किंग क्वैचशन्स” जैसी तकनीक सिखाती हैं जिन्हें इस उपन्यास को समझने के लिये भी प्रयोग में लाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि कोई भी रचना तभी अधिक सफल होती है जब पाठक उस से जुड़ पाता है और यहाँ जगहों के वर्णन पाठक को अपने से जोड़ते हैं। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए श्री सुमन कुमार घई (सह-संस्थापक निदेशक हि.रा.गी) ने भी पुस्तक में लहराती सड़कों और धुंध में सुरक्षित महसूस करने की जैसी उपमाओं प्रशंसा की और कहा कि सूफ़ी/पप्पू के माध्यम से ताहिर गोरा जी मानो उँगली पकड़ कर उन्हें बचपन की गलियों में ले जाते हैं, उन्होंने कहा कि उपन्यास के माध्यम से पाठक का अपने जीवन में लौटना और अपनी यादों के चित्र देखना उपन्यास की सफलता बताता है।

इस के बाद उपन्यासकार और टोरोंटो के प्रतिष्ठित पत्रकार, नाट्य-आलोचक श्री मयंक भट्ट ने उपन्यास के बारे में अँग्रेज़ी में बोलते हुए कहा कि “A lot of immigrant literature has been written so it is tough for any writer to create anything unique but Tahir has created this uniqueness through the characters and their environment. उन्होंने यह भी कहा कि “male and female characters of this book want to leave their alien culture and become free individuals after coming to Canada. On the whole it is a good creation of the writer”.

श्रीमती भुवनेश्वरी पाण्डेय ने भी पुस्तक पर अपने विचार रखते हुये कहा कि कई जगह उपन्यास में ऐसी छोटी-छोटी घटनायें आती हैं जो अपनी सी लगती हैं जैसे शायका का कोर्ट में यह सोचना कि काश जज स्त्री हो तो वह मेरी बात समझ कर निर्णय मेरे अनुकूल देगी, यही बात प्राय: सब स्त्रियाँ सोचा करती हैं। श्री विद्या भूषण धर ने कहा कि यह उपन्यास एक कथानक ना होकर कुछ घटनाओं का विवरण है जिस से यह एक आत्मकथा का बोध कराती है। तत्पश्चात श्री संदीप कुमार ने अपनी प्रतिक्रया देते हुए कहा कि यह उपन्यास व्यक्ति के नए माहौल में अपनी पहचान बनाने के संघर्ष की कथा है जो हर प्रवासी को अपनी ही कहानी लगेगी। उन्होंने कहा कि यह हैरानी की बात है कि ताहिर जी इस देश में अपनी युवावस्था में नहीं आये पर वे यहाँ के युवावर्ग की बातचीत, लहज़े और जीवन को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर सके हैं। उन्होंने ताहिर जी को खुल कर सच प्रस्तुत करने पर बधाई दी। सत्र में अंतिम समीक्षा प्रस्तुत करते हुये डॉ. शैलजा सक्सेना ने कहा कि  इस उपन्यास में  पाकिस्तान से आये नायक-नायिका खुलकर जीने के लिए एक “स्पेस” ढूँढ रहे हैं जो उन्हें पाकिस्तान के स्थान पर कनाडा में मिली। शहज़ाद के माध्यम से ताहिर जी ने इस्लाम और अपनी सभ्यता को दुनिया के बाकी धर्मों और सभ्यताओं से ऊपर समझने-कहने, पर जीवन में इसका उल्टा व्यवहार करने वाले लोगों पर कड़े व्यंग्य किये हैं। उपन्यास में युवा वर्ग के पार्टी और सैक्स पार्टनर ढूँढते रहना कहीं-कहीं अनावश्यक विस्तार से लिखा गया है। उन्होंने कहा कि इस उपन्यास से बहुत से लोग प्रसन्न होंगे तो कुछ लोग नाराज़ भी होंगे पर यह उपन्यास आज के समय की ज़रूरत है जिसके द्वारा ताहिर जी ने मनुष्य की समानता और सम्मान को स्थापित करने की चेष्टा की है। श्री देवेश शंकर ने ताहिर जी को बधाई देते हुये कहा कि अभी उन्होंने इस उपन्यास को पढ़ा नहीं है पर ताहिर जी की सच को पाठक/ दर्शक को लाने की सतत चेष्टा और आज की सारी बातचीत ने उन्हें उपन्यास को पढ़ने के लिये प्रोत्साहित किया है।

   अंत में, श्रीमती हलीमा (ताहिर गोरा की पत्नी) ने कहा कि धर्म और सैक्स दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन पर बात होती रहती है और इन विषयों पर सही, तटस्थ बात होने की ज़रूरत भी है। उन्होंने कहा जैसे रंग आपस में मिल कर रंगों का एब्स्ट्रैक्ट बनाते हैं, वैसे ही एक स्थान के लोग दूसरी ज़मीन पर जाकर एक नयी, मिली-जुली, बहुरंगी सभ्यता का “रंगमहल” बनाते हैं।  

अंत में  शैलजा जी ने ताहिर जी को अपनी रचना प्रक्रिया के विषय में बोलने के लिये आमंत्रित किया। ताहिर जी ने बताया कि पाकिस्तान में रहते हुये वे जिन विचारधाराओं और चीज़ों से परेशान होते थे, वे मन में जमा होती गईं और इस उपन्यास में उभर कर आई हैं। कनाडा आने से पहले वे लगभग १० वर्ष रूस में रह चुके थे और वहाँ के अनुभवों ने भी इस उपन्यास की विचारधारा को समृद्ध किया है। उन्होंने बताया कि इस से पहले उन्होंने “मोहलत” नाम का उपन्यास लिखा था और अब वे अपने नये उपन्यास पर काम कर रहे हैं। उन्होंने नये उपन्यास का कुछ हिस्सा पढ़ कर सुनाया जो बहुत रोचक था और सभी ने इस नये उपन्यास के लिये उन्हें शुभकामनायें दीं। प्रश्नोत्तर के दौर में श्रीमति सविता अग्रवाल जी ने उपन्यास में आये “जेहाद” शब्द की व्याख्या चाही। ताहिर जी ने बताया कि अरबी में इस शब्द का अर्थ “संघर्ष” था परन्तु धार्मिक/ राजनैतिक लोगों ने इस शब्द के अर्थ बदल दिये। अंत में ताहिर जी ने हिन्दी राइटर्स गिल्ड को कार्यक्रम के आयोजन के लिये धन्यवाद दिया और शैलजा जी ने ताहिर जी को ऐसा विचारोत्तेजक उपन्यास लिखने के लिये बधाई और हिरागि को लोकार्पण का अवसर देने के लिये धन्यवाद दिया जिस पर चर्चा करने और उसकी समीक्षा लिखने के लिये लेखकों की रचनात्मकता उत्साहित हुई। इस तरह कार्यक्रम का यह सत्र समाप्त हुआ।  

समयाभाव के कारण कार्यक्रम का दूसरा सत्र अत्यंत संक्षिप्त रहा पर हिरागि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की जन्मतिथि मनाने के लिये कटिबद्ध थी अत:कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए शैलजा जी ने निराला जी के जीवन के  प्रेरणास्पद और हिन्दी साहित्य के प्रति समर्पण से संबद्ध कुछ रोचक प्रसंग सुनाये जिसके बाद मानोशी चैटर्जी ने निराला जी के गीत “वीणा वादिनी वर दे”  को भावपूर्ण, मधुर स्वर में गाया। श्री अखिल भंडारी ने बताया कि निराला जी  कवि रूप में बहुत प्रसिद्ध हुये पर आधुनिक गज़ल लेखन का प्रारंभ भी निराला जी से माना जा सकता है। उनकी गज़लें आधुनिक भाव और शिल्प से सज्जित थीं जिनका अनुसरण करते हुए बाद में हिन्दी में गज़लकारों की एक पूरी परंपरा बनी। इसके बाद उन्होंने निराला जी की एक ग़ज़ल सुनाकर कार्यक्रम की समाप्ति की।

भाव और विचारों से परिपूर्ण इस गोष्ठी की सफलता यह थी कि तीन घंटे से अधिक चलने वाले इस कार्यक्रम के अंत में भी लेखकों और हिन्दी प्रेमियों में बहुत रचनात्मक उत्साह और ऊर्जा दिखाई देती थी। इस प्रकार हास-परिहास और सैहाद्र के सुंदर वातावरण में यह कार्यक्रम संपन्न हुआ।

प्रस्तुति: श्रीमती सविता अग्रवाल ’सवि’;डॉ. शैलजा सक्सेना