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हिन्दी के प्रचार
प्रसार में रेडियो की
भूमिका

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हिन्दी के प्रचार प्रसार में रेडियो की भूमिका

‘हिन्दी के प्रचार प्रसार में रेडियो की भूमिका’ इस विषय को लेकर हिन्दी राइटर्स गिल्ड ने 24 जुलाई को एक फेसबुक लाइफ पर एक आत्मीय बातचीत का आयोजन किया । यह गुरु पूर्णिमा का पवित्र दिन था । इसमें रेडियो से संबंधित कई अनुभवी विद्वानों ने वार्ता प्रस्तुत की । सर्वप्रथम हमें ऑल इंडिया रेडियो की चिर परिचित ध्वनि सुनाई पड़ी जो सचमुच प्रभावशाली थी क्योंकि इससे कई श्रोताओं को अपने बचपन की मधुर स्मृतियों ने आ घेरा । इस ध्वनि के साथ कई लोगों की बचपन की स्मृतियां जुड़ी थीं। इस कार्यक्रम के आरंभ में डॉक्टर शैलजा सक्सेना जी ने सभी वक्ताओं तथा मंच पर भाग लेने वाले विद्वानों का स्वागत किया और रेडियो की इतिहास को संक्षेप में प्रस्तुत किया ।
बीसवीं शताब्दी के आरंभ में रेडियो सारे विश्व में समाचार जानने का प्रमुख साधन था भारतवर्ष में भी ऑल इंडिया रेडियो तथा बीबीसी रेडियो से सारे विश्व के समाचार जाने जाते थे। प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के समय बीबीसी रेडियो के द्वारा विश्व की समस्त खबरें लोगों तक पहुंचती थीं। रेडियो केवल समाचार का जानने साधन ही नहीं था, वरन कालान्तर में उसमें कितने सांस्कृतिक तथा शिक्षाप्रद कार्यक्रम भी होने लगे यह तो सारा विश्व जानता है । भारतवर्ष में हम लोग रेडियो के माध्यम से शास्त्रीय तथा आधुनिक संगीत सुनते थे, नाटक तथा बच्चों के लिये भी कार्यक्रम होते थे।
रेडियो ने एक दीर्घकाल से हमारी मेधा, हमारी संस्कृति और हमारी जन चेतना को झंकृत किया है और आज भी सारे विश्व में छोटे-छोटे ग्रामों तक में रेडियो की पहुंच है। अब भी रेडियो मनोरंजन तथा जानकारी एक प्रमुख साधन है | यह आत्मीय बातचीत रेडियो और हिन्दी के सामंजस्य के संबंध में है ।
आज के समाज में रेडियो के सम्मुख किस प्रकार की चुनौतियां हैं किस प्रकार यह सहायक हो सकता है हमारे जीवन में इस संबंध में आज की वार्ता होगी और इस में भाग ले रहे हैं कई विद्वान और आज की संचालिका हैं श्रीमती अंबिका शर्मा जो मॉन्ट्रियाल से जुड़ी हैं हमारे साथ ।
इसके पश्चात् शैलजा सक्सेना जी ने संचालन का भार अम्बिका शर्मा जी को सौंपते हुए उनका परिचय दिया कि वे कनाडा की एक प्रसिद्ध कवयित्री तथा रेडियो प्रसारक हैं | अंबिका जी कबीर सेंटर से जुड़ी हैं। अपने रेडियो प्रोग्राम के अंतर्गत उन्होंने कई विद्वानों से साक्षात्कार भी किए हैं । इसके उपरान्त अम्बिका जी ने इस वार्ता में भाग लेने वाले वक्ताओं का परिचय दिया।
सर्वप्रथम इस वार्ता में भाग लेने वाले श्री लक्ष्मी शंकर बाजपेयी जी का परिचय दिया। । इनका कार्यक्षेत्र अत्यंत विस्तृत रहा है। ये एक गीतकार, साहित्यकार हैं तथा आकाशवाणी दिल्ली के पूर्व निदेशक रह चुके हैं इनको कई सम्मान भी मिल चुके हैं। इन्होंने अनेक व्यंग तथा लघु कथाएं लिखी हैं, कई प्रतिष्ठित कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ किया है। इन्होंने कई विद्वानों से साक्षात्कार भी किया है। इनका मीडिया अध्यापन में विस्तृत अनुभव रहा है, आकाशवाणी के द्वारा आंखों देखा हाल भी प्रस्तुत किया है। पोलियो उन्मूलन अभियान में भी भाग लिया है।
श्री बाजपेयी जी ने बताया कि भारत वर्ष में स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात जब देश में शिक्षा का अभाव था, उस समय रेडियो एकमात्र ऐसा साधन था जिसके द्वारा जन जन में गांव तक लोगों को समाचार मिलते थे और रेडियो मनोरंजन का एकमात्र साधन था और इस प्रकार हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार में यह बहुत सहायक रहा विशेषकर गैर हिन्दी प्रदेशों में लोगों ने रेडियो सुन सुन के लोगों ने हिन्दी सीखी, यह बहुत महत्वपूर्ण है। आकाशवाणी ने भारतवर्ष की करोड़ों की जनता को हिन्दी से जोड़ा और प्रवासी भारतीयों को भी भारत से जोड़े रखा यह रेडियो का बहुत बड़ा योगदान है।
इसके उपरान्त कैनेडा के डॉक्टर नरेंद्र ग्रोवर जी से वार्ता की गयी , वे एक पशु चिकित्सक हैं तथा अच्छे कवि व् व्यंग्य लेखक भी हैं। हर शनिवार को अत्यंत निष्ठा के साथ रेडियो प्रोग्राम करते हैं। उन्होंने एक बहुत अच्छी बात यह कही कि हमने हिन्दी का दीप जलाया है और उसकी रोशनी तो पहुंचेगी ही। यह हम लोगों के प्रयास पर है कि कितनी दूर तक रोशनी जाती है पर हमें लगे रहना है ।
इसके पश्चात् मंच पर आयीं विनीता कादंबरी जी, जो युवा वर्ग के साथ भारतवर्ष में काम कर रही हैं । श्रीमती विनीता काम्बीरी दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्रवक्ता हैं तथा एफ एम रेनबो कार्यक्रम की प्रस्तुतकर्ता भी। इनको अध्यापन के लिए अनेक सम्मान भी मिल चुके हैं ,हिन्दी रत्न सम्मान भी मिला इत्यादि। उनसे प्रश्न पूछा गया कि क्या युवा पीढ़ी हिन्दी सीखना चाहती है, उन्होंने कहा कि उनकी दृष्टि में भारत वर्ष में कई ऐसे युवा हैं, जो साहित्य पढ़ते हैं और जितना साहित्य से परिचित होते जाते हैं, उनकी हिन्दी बेहतर होती जाती है । उनमें हिन्दी सीखने की लगन है और उनको पूरा विश्वास है कि रेडियो के द्वारा वे भाषा का शुद्ध उच्चारण सीखते हैं और भाषा की सहजता और शालीनता भी सीखते हैं। उनकी बातों में आशावाद भरपूर था।
अंबिका जी ने विद्वानों से यह भी पूछा कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार की जो समस्याएं हैं उसका क्या समाधान है ? डॉक्टर विजय राणा के अनुसार भाषा के अनुशासन के साथ समझौता कभी भी नहीं करना चाहिये । हिन्दी में बहुत अधिक अंगरेजी मिला कर बोलना सर्वथा अनुचित है ।उन्होंने एक प्रसिद्ध इतिहासकार अवतार सिंह जी के कार्यक्रम के विषय में बताया कि उनके हिन्दी के कार्यक्रम में केवल २७ लोग ही थे जबकि उनके अंग्रेज़ी के कार्यक्रम में इससे तीन गुना लोग थे। तब प्रश्न यह है कि कला व संस्कृति सम्बंधित एक बौद्धिक कार्यक्रम जन जन तक कैसे पहुँचें ? यह एक चिंताजनक बात है l
श्री लक्ष्मी शंकर बाजपेयी जी सुभाष राणा जी की बात से सहमत थे l उन्होंने एक उदाहरण दिया कि मध्य प्रदेश के एक छोटे से कस्बे सुप्री में एक छोटे बच्चे ने जब स्कूल में अपने मित्रों से हिन्दी में बात किया तो उसको सजा मिली कि उसने हिन्दी में क्यों बात की l यह मानसिकता बहुत दुखद है l यदि हम चाहते हैं कि भारतवर्ष में हिन्दी का समुचित प्रचार-प्रसार हो तो इसे हमें बदलना ही होगा l कार्यक्रम के अंत में, डॉक्टर शैलजा सक्सेना ने कहा कि भाषा की दशा तथा दिशा को सुधारने के लिए हमें एकजुट होकर काम करना होगा। हमारी संस्था गत १३ वर्षों से मासिक गोष्ठियों के द्वारा, आभासी गोष्ठियों के द्वारा और फेसबुक लाइव के कार्यक्रम में देश विदेश के विद्वानों से वार्ता करने के द्वारा हिन्दी का दिया जला रही है और जलाती ही रहेगी ताकि हिन्दी का प्रचार-प्रसार अबाध गति से बढ़ता ही रहे, अग्रसर होता ही रहे और हिन्दी भाषा और साहित्य की दूरी को हम मिलाने का प्रयत्न करते रहेंगे l इस प्रकार एक बहुत ही सुंदर आभासी फेसबुक लाइफ का समापन सकारात्मक रूप से संपन्न हुआ l शैलजा जी द्वारा किया गया आरंभिक परिचय तथा समापन सन्देश प्रभावशाली था और अम्बिका जी का सञ्चालन भी । इस कार्यक्रम की तकनीकी सहायता तथा सुंदर फ्लायर के लिए पूनम चंद्रा 'मनु' को अनेक धन्यवाद!

रिपोर्ट : श्रीमती आशा बर्मन
इस कार्यक्रम का वीडियो देखने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें: Click here

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