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वादों की परछाइयाँ

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पूनम चंद्रा ’मनु’ के पहले उपन्यास ’वादों की परछाइयाँ’ का लोकार्पण

हिन्दी राइटर्स गिल्ड की 12 मई, 2017 की गोष्ठी में संस्था की सक्रिय सदस्या और सलाहकार मंडल की सदस्या श्रीमती पूनम चंद्रा ’मनु’ के पहले उपन्यास ’वादों की परछाइयाँ’ के लोकार्पण का कार्यक्रम बहुत सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम का आयोजन चिंकूज़ी पार्क लायब्रेरी में दोपहर २ बजे से ५ बजे के बीच किया गया था।
कार्यक्रम का प्रारंभ हिन्दी राइटर्स गिल्ड की सह-संस्थापक निदेशिका डॉ. शैलजा सक्सेना ने किया और कार्यक्रम में सबका स्वागत करते हुये पूनम चंद्रा ’मनु’ को बधाई दी। टोरोंटो के लोकप्रिय हास्य-व्यंग्य के कवि, एन.जे. टी.वी, के कार्यक्रम के संचालक श्री अजय गुप्ता का परिचय देते हुये उन्हें कार्यक्रम के संचालन के लिये आमंत्रित किया। श्री अजय जी ने ’मनु’ को उनके पहले उपन्यास की बधाई देते हुये ’मनु’ का विस्तृत परिचय दिया जो उन्होंने ऑडियो रिकार्डर पर पहले से रिकॉर्ड कर रखा था और फिर उन्हें बोलने के लिये आमंत्रित किया। मनु ने सबको आने के लिए धन्यवाद देते हुये कहा कि ’यह उपन्यास पहले ‘हिन्दी टाइम्स’ में श्री सुमन घई जी के सहयोग से धारावाहिक रूप से छप चुका है और लोगों को पसन्द आने के बाद इसे प्रकाशित रूप में सामने लाने की योजना बनी। मनु ने कहा, “वादे चाहें किसी और से किये जाते हैं पर निबाहे खुद से जाते हैं, बार- बार खुद को याद दिलाया जाता है कि हमने किसी से वादा किया है, तो मानसी (इस उपन्यास की नायिका) ने भी कुछ ऐसा ही किया।“ इसके बाद उन्होंने उपन्यास में से कुछ अंश पढ़ कर सुनाये जिसके बाद उपन्यास पर चर्चा प्रारंभ हुई।
इस उपन्यास पर चर्चा करने वाली पहली वक्ता थीं, श्रीमती कृष्णा वर्मा! कृष्णा जी ने इसे ‘चिरंतन प्रेम की तलाश करता हुआ उपन्यास’ कहा। उन्होंने इसके कवर पर बने चित्र को उपन्यास की व्याख्या करता हुआ बताया और इसकी नायिका को एक सम्पूर्ण स्त्री कहा जो अपनी बौद्धिक पहचान बनाने के लिये कोई समझौता न करते हुये अपने वादे को निबाहने के लिये संघर्ष करती है। इस उपन्यास की वर्णन शैली को चित्रात्मक और काव्यात्मक बताते हुये उन्होंने मनु को आगामी उपन्यासों के लिए शुभकामनाएँ दीं।
दूसरी वक्ता थीं मानोशी चैटर्जी। उन्होंने कहा कि इस उपन्यास को पढ़ते हुये यूनिवर्सिटी के दिन याद आ गये। हम सभी यूनिवर्सिटी से विभिन्‍न कार्यक्रमों में भाग लेने जाते रहे हैं अत: इस वर्णन से सभी लोग जुड़ सकते हैं। उन्होंने इस “कनेक्टिविटी” या पाठकों के साथ जुड़ाव को इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया। इस उपन्यास के प्रारंभ में लिखे वाक्य को सत्य बताते हुये उन्होंने कहा कि हम सब उस समय से ही जुड़े हैं जिसे मनु ने कहा “ज़िक्र उस ज़माने का है जब ..” इस उपन्यास के कवर चित्र की प्रशंसा करते हुये मानोशी ने उसके चित्रकार, श्री विजेन्द्र एस विज को भावों की प्रस्तुति में सिद्धहस्त बताया। संवादों और कथानक की सरलता और प्रवाह की प्रशंसा करते हुये उन्होंने मनु को इस उपन्यास की प्रसिद्धि के लिये शुभकामनाएँ दीं।
डॉ. शैलजा सक्सेना को अजय गुप्ताजी ने स्पष्ट और शास्त्रीय चर्चा करने के लिये आमंत्रित किया। शैलजा सक्सेना ने मनु को बधाई देते हुये कहा कि इस उपन्यास की शास्त्रीय समीक्षा करने के स्थान पर इस उपन्यास के मीठी उदात्त प्रेमानुभूति में बहना उन्हें अधिक सुखद लगा। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास ’एक बड़ी पेंटिंग है’ जिसे मनु ने बहुत सुन्दर तरह से बनाया है। इस उपन्यास के संवादों, वर्णन, कहानी आदि सब एक “विजिउल”, एक फिल्म की तरह चलती हैं और भाषा में मनु ने अपनी प्रिय काव्यात्मक “सूत्रात्मक शैली” का प्रयोग करते हुये साधारण स्थितियों, संवादों में गहराई और जीवन दर्शन के छोटे-छोटे सूत्र देकर इस उपन्यास की गंभीरता और स्तर को बहुत बढ़ा दिया है। शैलजा ने मनु को मन बाँधने वाले इस उपन्यास की बधाई देते हुये आगामी लेखन के लिये शुभकामनायें दीं। अजय गुप्ता जी ने संचालक भूमिका को अच्छी तरह निबाहते हुये उपन्यास में बने चित्रों की ओर ध्यान दिलाया और अपनी सटीक टिप्पणियों द्वारा उपन्यास के प्रति श्रोताओं की उत्सुकता बढ़ाई। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुये उन्होंने सब से पहले मनु के पुत्र नक्षत्र चंद्रा को कुछ कहने के लिये आमंत्रित किया। नक्षत्र १२ वीं कक्षा के छात्र हैं। उन्होंने अपनी माँ की उपलब्धियों पर गर्व करते हुये कहा कि वे चाहेंगे कि उनकी माँ ऐसे ही लिखती रहें और उनका लेखन सबको पसंद आये। सभा के रोचक प्रश्नों का मीठी मुस्कुराहट और सहज संकोच से उत्तर देते हुये नक्षत्र ने सबका मन मोह लिया। अजय जी ने संक्षिप्त टिप्पणियों के लिए कुछ और लोगों को आमंत्रित किया जिनमें पहले थे- श्री अखिल भंडारी जी, जो गज़ल की समझ और अपनी गज़लों के लिये जाने जाते हैं। अखिल जी ने उपन्यास की भाषा को रोचक बताते हुए कहानी में वर्णन के संतुलन की ओर ध्यान आकर्षित किया तथा संवादों को प्रवाहपूर्ण कहा जिससे एक सिटिंग में पढ़ने का मन करता है। इसके बाद टिप्पणी दी, संदीप कुमार जी ने। संदीप जी ने इस उपन्यास के तीन बिंदुओं- भाषा, संवेदना और परिवेश की चर्चा करते हुए कहा कि उपन्यास की संवेदना शाश्वत प्रेम की संवेदना है जिसे जाने-पहचाने कॉलेज के वातावरण में रोचक भाषा और संवादों में प्रस्तुत किया गया है। तीसरी टिप्पणी दी आचार्य संदीप त्यागी “दीप” ने जो अपने संस्कृत और हिन्दी ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने उपन्यास लिखने की कठिनता की ओर ध्यान दिलाते हुये कहा कि हिन्दी प्रेमियों को किताब खरीद कर पढ़नी चाहिये और पाठक का सब से बड़ा सहयोग किताब को पढ़ना होता है, उसे खरीद कर रख देना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि उपन्यास ने प्रेम के उदात्त मानक प्रस्तुत करते हुये, शरीर से उठकर आत्मिक प्रेम के उदाहरण को प्रस्तुत किया है। अत: इसे हमें नई पीढ़ी को सुनाना-पढ़ाना चाहिये जिससे वे इस पारंपरिक, उदात्त प्रेम को समझ सकें। इस के बाद अजय गुप्ता जी ने सभा के उपस्थित हिन्दी प्रेमियों को इच्छानुसार माइक पर आने के लिये आमंत्रित किया। श्रीमती आशा बर्मन, लता पांडे, भुवनेश्वरी पाँडे, श्री भगवत शरण श्रीवास्तव, राज माहेश्वरी, नरेन्द्र ग्रोवर, इकबाल बरार आदि विद्वत जनों ने मनु को बधाई और शुभकामनायें दीं। मनु एक बार मंच पर पुन: प्रश्नों के उत्तर देने आईं और इस उपन्यास के अनेक आयामों पर अपने विचार रखते हुये उन्होंने श्रोताओं की जिज्ञासाएँ शांत कीं। तत्पश्चात् बरार जी ने एक गीत सुनाया और कार्यक्रम के अंत में अगले दिन के मातृ दिवस पर मानोशी चैटर्जी द्वारा लिखे और गाये गीत “माँ! तुम प्रथम बनीं गुरू मेरी” से हुआ। अगले माह की ९ तारीख को होने वाले ‘लघु नाट्य पर्व’ की घोषणा की गई और भोजन के प्रबंध के लिये मनु और श्री निर्मल सिद्धु जी को धन्यवाद दिया गया जो अपने बेटे के विवाह की खुशी के उपलक्ष्य में लड्डू और समोसे लाये थे।चाय के साथ मनु द्वारा लाये ढोकलों, नमकीन पारे और बर्फी का स्वाद और परस्पर बातचीत का आनंद लेते हुये कार्यक्रम का समापन हुआ।
इस कार्यक्रम में लगभग ५० लोगों ने भाग लिया और यह कार्यक्रम ज़ी टी.वी.द्वारा रिकॉर्ड किया गया तथा एन. जी. टी.वी. द्वारा भी इसे लाइव-कवर किया गया। इसके लिये हम श्री चारी जी, पुरुषोत्तम गोयल जी तथा श्री अजय गुप्ता जी के आभारी हैं।

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