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क़ातिल का गीत

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गिलर पुरस्कार से सम्मानित सुप्रसिद्ध लेखक एम.जी. वसानजी के हिंदी में अनुवादित उपन्यास ‘क़ातिल का गीत’ पर चर्चा

गिलर पुरस्कार से सम्मानित सुप्रसिद्ध लेखक एम.जी. वसानजी के हिंदी में अनुवादित उपन्यास ‘क़ातिल का गीत’ पर चर्चा हिन्दी राइटर्स गिल्ड की मासिक गोष्ठी में 9 सितम्बर, 2012, को दोपहर दो बजे से पाँच बजे तक संपन्न हुई । इस सभा में श्री एम.जी. वसानजी को सम्मानित किया गया।
श्री एम.जी. वसानजी पाँच सुप्रसिद्ध उपन्यासों के लेखक हैं ‘द गनीसैक’ को ‘रीजनल कॉमनवे़ल्थ राइटर्स प्राइज़’ मिला, ‘नो न्यू लैंड, द बुक ऑफ सीक्रेट्स’ एवं ‘अमेरीका और द इनबिटवीन वर्ल्ड ऑफ विक्रम लाल’ को गिलर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, जो कैनेडा में साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार है।
‘क़ातिल का गीत’ उपन्यास जो मूल रूप में अंग्रेज़ी के ‘असैसंज़ सौंग’ का हिंदी अनुवाद है। उपन्यास का अनुवाद जाने-माने अनुवादक, आलोचक एवं कहानीकार श्री हरीश नारंग और चारु शर्मा ने किया, जो अंग्रेज़ी की प्रोफेसर हैं और जानी-मानी अनुवादक, आलोचक भी हैं।
सभा में मान्य अतिथियों में इंडो-कैनेडा चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स के भूतपूर्व अध्यक्ष श्री सतीश ठक्कर, चीफ़ एड्मिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर श्री मयंक भट्ट, राना के अध्यक्ष श्री योगेश शर्मा, हल्क़ा अर्बाब-ए-ज़ौक कैनेडा के श्री ताहिर असलम गोरा, राइटर्स फ़ोरम के श्री मुनीर परवेज़, हिन्दी साहित्य सभा से श्री के.सी. भटनागर, ब्रैम्पटन लाइब्रेरी सिस्टम की मल्टीकल्चरल सर्विसेज की कोऑर्डिनेटर सुश्री सरला उत्तंगी आदि पधारे थे। हिंदी राइटर्स गिल्ड के सभी नियमित सदस्यगण उपस्थित थे।
सभा की शुरुआत हिंदी राइटर्स गिल्ड के डाइरेक्टर श्री सुमन घई ने सबका स्वागत करते हुए की और श्री एम.जी. वसानजी को शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया। श्री सुमन घई ने कहा कि हिंदी राइटर्स गिल्ड हिंदी में प्रकाशन और अनुवाद कार्य को प्रोत्साहित करती है। घई जी ने जानी-मानी लेखिका और चित्रकार श्रीमती मीना चोपड़ा एवं उनके पति श्री भूपेंद्र विरदी और श्री मयंक भट्ट को धन्यवाद दिया क्योंकि उन्होंने इस कार्यक्रम को आयोजित करने में विशिष्ट भूमिका निभाई। इसके बाद उन्होंने श्री एम.जी. वसानजी के लेखन कार्य का विस्तृत परिचय देते हुए कहा कि एलिस मुनरो के बाद वसानजी को ही अब तक दो बार गिलर पुरस्कार मिला है। उन्होंने श्री एम.जी. वसानजी को अपनी पुस्तक के अंश पढ़ने के लिए आमंत्रित किया और श्रीमती मीना चोपड़ा जी ने वे अंश हिंदी में अनुवादित उपन्यास से पढ़कर सुनाए।
डॉ. शैलजा सक्सेना ने साहित्यिक शब्दावली में अत्यंत सुन्दर विशलेषण किया और पूरी सहजता व विस्तार से उपन्यास की विषय वस्तु, भाषा तथा पात्रों पर चर्चा की।
उपन्यास की कथा के समय, काल के आधार पर तीन भागों में समानन्तर चलती है। १२वीं शती के नूरफ़जल का इतिहास, करसन दरगाहवाला के बचपन से किशोरावस्था तक का १९६० का काल और २००३ का वर्तमान काल। कथा के मुख्य पात्र पिता दरगाह साहिब नूर तेजपाल, करसन दरगाहवाला, उनकी पत्नी माधवी, भाई मंसूर आदि हैं। कथा हरिपीर बाग (कल्पित), गुजरात और अमेरिका के वातावरण में गूंथी गई है।
शैलजाजी ने कहा कि लेखक ने कई ज्वलंत प्रश्न हमारे सामने रखे हैं , क्या आदमी स्वतंत्र होने के लिए अपनी ज़िम्मेदारी से स्वतंत्र है? क्या आदमी देश के इतिहास, हालत से स्वतंत्र है? धर्म, विश्वास (बिना तेल के दिया जलना, साहिब के चरित्र को भगवान के रूप में देखना) पर भी प्रश्न उठाए हैं, सच क्या है? सारे उत्तर पाठकों पर छोड़ दिए हैं।
उपन्यासकार ने गोधराकांड के सन्दर्भ में हिंदू-मुस्लिम संबंध को तटस्थता से प्रस्तुत किया है। काल सीमा तीन भागों में विभाजित है फिर भी लेखक ने इन तीनों स्तरों को बखूबी बाँधा है, सरलता से तारीखों के साथ-साथ भाषा, संस्कृति भी बदलती है। लेखक किसी का भी पक्षपात नहीं करता है, वह अध्यात्म या जीवन के पक्ष में ही होना चाहता है।
श्री सुमन घई ने उपन्यास कि पाठकों के दृष्टिकोण से चर्चा की कि यह एक केवल कहानी नहीं है बल्कि दर्शन, इतिहास और सामाजिक और आंतरिक संघर्ष की यात्रा है, जो हमें गुजरात से अमेरीका, वेंकूवर और फिर भारत वापस ले आती है। नन्हे बालक की जिज्ञासा, प्रश्न और उनके उत्तर खोजने की यात्रा है जो मध्य कालीन इतिहास से वर्तमान काल तक चलती है। पाठक करसन के बचपन की चाँद पर जाने की कल्पना के साथ-सथ बड़े होते हैं - यही लेखन की ही शक्ति है। बड़ा होता हुआ नूर करसन पिता को दोषी समझता है, चमत्कार को नकारता है, परिवार को टूटते हुए देखता है। चाचा व भाई के धर्म परिवर्तन को लेखक ने बहुत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है। उन्होंने एक बहुत ही सहज प्रश्न उठाया कि क्या अनुवादित उपन्यास कुशलता से मूल भाव को बाँध सकेगा? पर इस उपन्यास का अनुवाद बहुत ही सटीक और मूल संवेदना को व्यक्त करने में सफल रहा है अनुवादकों को बधाई!
निष्कर्ष रूप में ‘क़ातिल का गीत’ उपन्यास का कलेवर पूरी तरह विभिन्‍न परिवेशों को समेटे हुए हमें अतीत से वर्तमान के धरातल का बोध कराता है. भाषा की गहनता व सहजता वातावरण, भाषा–शैली, संवाद चरित्रों सभी को बख़ूबी गहराई से व्यक्त करती है। प्रारम्भ से अंत तक कथा की बुनावट में उत्सुकता बराबर बनी रहती है। लेखक की रचना में एक तीव्र अंतर्दृष्टि झलकती है जो पाठकों को उपन्यास के पात्रों से या कहें कि उनकी अपनी संवेदना से जोड़े रखती है और हमें एक बहुत ही सशक्त रचनाकार के विचारबोध से साक्षात्कार कराती है। गहरी, सहज भाषा व सूक्ष्म, सुलझे विचारों की दोहरी सार्थकता के लिए लेखक को बहुत - बहुत बधाई!
इसके बाद प्रश्न और उत्तर चर्चा में श्री एम.जी. वसानजी ने श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर दिए। सभी ने उपन्यास की सफलता पर लेखक को बधाई दी और काफी लोगों ने उपन्यास ख़रीदा।
अंत में जलपान के साथ सभा का समापन हुआ।
– डॉ. रेणुका शर्मा

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