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दीप जलाए रखना

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“दीप जलाए रखना”

हिन्दी राइटर्स गिल्ड कैनेडा की मासिक गोष्ठी में जले भावों और आशाओं के शब्द दीप! हर माह के तीसरे शनिवार की सब आतुरता से प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि यह दिन होता है हिंदी राइटर्स गिल्ड की मासिक गोष्ठी का। 21 अक्टूबर दोपहर डेढ़ बजे से साढ़े चार बजे तक स्प्रिंगडेल लाइब्रेरी में नवरात्रि और दशहरे के पर्व-समय पर कवि गोष्ठी 'दीप जलाए रखना' के आयोजन के लिए एकत्रित हुए। कमरे में एक ओर बंदिता सिन्हा जी द्वारा लायी श्री गणेश जी की मूर्ति फूलों और अनेक दियों से सुसज्जित थी, तो दूसरी ओर योगेश ममगायीं जी द्वारा लाए जलपान, चाय और बंदिता सिन्हा जी द्वारा लाई गई उपवास की खीर का आनंद उपस्थित दर्शक ले रहे थे।
इस तरह के सौहार्द और आत्मीयता के सुखद वातावरण में कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। डॉ. नरेंद्र ग्रोवर ने संचालन की बागडोर थामी और सर्वप्रथम डॉ. बंदिता सिन्हा को मंच पर आमंत्रित किया।
डॉ. बंदिता सिन्हा ने बहुत ही सुंदर कविता द्वारा चन्द्रदेव की राम जी से शिकायत का वर्णन किया कि वे तो सबकी सुध लेने वाले हैं तब अमावस्या के दिन अयोध्या लौटकर उन्होंने चंद्रमा को क्यों भुला दिया? चंद्रमा के अनेक मीठे उलाहनों के अंत में जब राम जी ने उन्हें अपने नाम से जोड़ कर 'रामचन्द्र' रूप में प्रसिद्ध होने की बात कही तब जाकर चन्द्रदेव सन्तुष्ट हुए।
इसके उपरान्त डॉ. शैलजा सक्सेना जी ने विश्व भर पर छा रहे युद्ध के संकट के बादलों के प्रति चिंता व्यक्त की और अपनी कविता के माध्यम से कहा, “घर आँगन, सरहद-चौकी पर एक दीप जलाए रखना। अँधियारा हो घना किन्तु तुम आस जगाए रखना। बारूदों का धुआँ आँख में आँसू लाता है, मासूमों की लाशों चढ़ कर ज़ालिम आता है . . . सौ-सौ आँसू रोती माँ को कैसे समझाओगे, फिर से ईश्वर को पुकारना रीत बनाए रखना, एक दीप जलाए रखना।”
दो नन्हे बालकों, रूबी और ऋषि शर्मा ने बहुत प्यारी-सी कविता में दीवाली की मिठाइयों, नए कपड़ों और पटाखों का वर्णन करते हुए कहा कि इस दिन 'खुशियों की बौछार हो जाती है।' ऋषि केवल छह वर्ष के हैं और संस्था की हिन्दी प्रतियोगिता में पहले भी भाग ले चुके हैं। हिन्दी राइटर्स गिल्ड कैनेडा के तरुण मंच पर हर मासिक गोष्ठी में दो या तीन बच्चों को मंच दिया जाता है।
संस्था में सभी उपस्थित हिन्दी प्रेमियों को “ओपेन माइक” कार्यक्रमों में कुछ कहने के लिए आमंत्रित किया जाता है। इस बार सभा में कई नए लोग उपस्थित थे। सभी का स्वागत किया गया। पहली बार आए श्री राकेश शर्मा ने बताया कि उन्होंने लाल क़िले के एक कवि सम्मेलन में श्री हरि ओम पँवार जी को सुना और हिंदी में उनकी रुचि प्रारंभ हुई जो बाद में अनेक कवि सम्मेलनों को सुनते हुए बढ़ती चली गयी। उन्होंने यह भी कहा कि विदेश में रहते हुए मातृभाषा का सम्मान, अपनी माँ के सम्मान तुल्य होता है।
डॉ. बंदिता सिन्हा ने दूसरी कविता नन्ही अविका सिंह के साथ प्रस्तुत की, उन्होंने अपनी कविता द्वारा कहा कि संसार में सुधार लाने के लिए चौबीस घंटे पर्याप्त नहीं है, पचीस होने चाहिए और राम, कृष्ण, नानक सभी एक साथ धरती पर अवतरित हो जाएँ तो सम्भवतः संसार का उद्धार हो पायेगा। अविका ने उत्तर में कहा कि हम चौबीस घण्टों में ही अमन लाएँगे और बच्चों में ही नानक, कृष्ण और राम जगायेंगे। श्रीमती प्रीति अग्रवाल ने अपनी कविता 'रोशनी' द्वारा संदेश दिया कि ऊँची इमारतों और अन्य भौतिक उपलब्धियों को ही व्यक्ति सब कुछ समझने की ग़लती न करे, अपितु अपने नैतिक मूल्यों और ऊँचे संस्कारों रूपी दीपों से जीवन को रोशन करे।
डॉ. ग्रोवर ने अपने सधे और काव्यमय संचालन से सबको बाँधते हुए अनेक सूत्र वाक्य देते हुए मूल मंत्र दिया कि 'जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है'। इसले बाद उन्होंने श्रीमती लता पाण्डेय को मंच पर बुलाया। लता जी ने कहा कि दिवाली का त्योहार प्रेम, सौहार्द, विनयशीलता और शुभकामनाओं के दीप जलाने का त्योहार है। अपनी कविता द्वारा उन्होंने यह भी कहा कि 'असीम कुछ भी नहीं, मुझे हर वस्तु सीमा में चाहिए।’
श्री सुनील शर्मा अपने परिवार सहित उपस्थित थे। वे अमरीका से निकलने वाली 'सेतु' पत्रिका को टोरोंटो से अंग्रेज़ी भाषा में निकालते हैं। उन्होंने अपनी कविता में संबंधों को जोड़ने और भाषा पर बल देते हुए कहा कि हिंदी के माध्यम से हम अपने देश से जुड़ते हैं और 'दोस्तों से मुलाक़ातों को हम बसंत कहते हैं'। उनकी सुपुत्री सृष्टि शर्मा जी ने एक बहुत सुंदर कविता में कहा कि दीपावली नईं उम्मीदों, बेहतर रिश्तों और अविस्मरणीय यादों को सहेज कर रखने का त्योहार है क्योंकि 'इंसान के जाने के बाद भी इन यादों की ख़ुश्बू रहती है।' उनकी पत्नी संगीता शर्मा जी ने 'समाँ' शीर्षक की कविता द्वारा कहा कि एक दिन जब कैनेडा में 'ठंड गुलाबी हुई' तो उन्हें कुछ 'डेजा वू' सा हुआ और अपने देश की 'पीली गुनगुनी धूप' की याद दिला दी और वो वहाँ की अनेक यादों में खोने लगी और अंत में वहाँ के अपनत्व और सौहार्द को तरसने लगी। योगेश ममगाईं जी ने अपने कविता, 'क्यों सरहद पे' द्वारा उकेरा कि यदि इंसान अपनी सीमाओं में रहना सीख ले तो युद्ध टाले जा सकते हैं। 'युद्ध की विध्वंसता और धुएँ में शहीदों की माताओं के आँसू नहीं दिखा करते।' उन्होंने एक और सुंदर कविता में प्रवासी द्वारा अनेक यादों को बक्से में भर के लाने की बात कही और यह भी कि बहुत कुछ छोड़ आने की एक सकारात्मक बात यह है कि “अगर इन्हें छोड़ कर न आता, तो लौट के जाता कैसे?” यह कविता प्रवासी के भारत लौट कर जाने की आशा और छोड़ कर आने के दुख को बहुत मार्मिक तरह से बताती है। कृष्णा वर्मा जी ने अपनी प्रभावपूर्ण कविता में कहा कि 'चेहरों से कहाँ लोगों का पता पड़ता है, वो तो परतों में खुला करते हैं।' जब तक इंसान को तृष्णा का स्वर्ण मृग लुभाता रहेगा तब तक उसके जीवन में युद्ध छिड़ता रहेगा। उन्होंने अपनी कविता माँ के माध्यम से, नानी के जाने पर माँ के दुख को दिखाया और छोटी बच्ची के रूप में अपनी माँ की चिंता की। अलग तरह की यह कविता, जीवन की घटनाओं और भावों के इतिहास को दोहराने के चक्र को दिखाती है। वरिष्ठ लेखिका इंद्रा वर्मा जी ने श्री हरिवंशराय बच्चन जी की कविता, 'अँधेरे का दीपक' का पाठ किया जिसका संदेश अति सुंदर और सकारात्मक था, 'अँधेरी रात में दीवा जलाना कब मना है॥ विध्वंस में भी शान्ति की कुटिया बनाना कब मना है॥ ले अधूरी पंक्ति कोई, गुनगुनाना कब मना है॥ खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है॥ किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है . . . !!’
पंजाबी और हिन्दी की लेखिका कुलदीप अहलुवालिया जी ने अपनी कविता में बहुत सुन्दर तरह से “रिश्तों के बाज़ार में” मिलने वाले अनेक तरह के रिश्तों के रूप दिखाए और अंत में कहा कि केवल एक सच्चा मीत ही होता है जो दुख में तुम्हारे अश्रु रूपी मोतियों को बटोरता है।
प्रो. सतीश सेठी जी ने कहा कि यदि इंसान सुंदर हो तो परिवार सुंदर बनता है और उसी से समाज, देश और संसार भी सुंदर बनता है। उन्होंने अपनी कविता द्वारा पुराने दिनों को याद किया और शोक व्यक्त किया कि उन्हें लौटाया नहीं जा सकता पर यह संदेश भी दिया कि दुनिया निरन्तर चलते रहने का ही नाम है। श्रीमती सुषमा शर्मा जी ने किसी और के द्वारा लिखे गद्य को प्रस्तुत करते हुए कहा कि प्राचीन पीढ़ियों ने नैतिक मूल्य और संस्कार, पवित्र दिनचर्या सिखाई थी और इन सब का पीछे छूट जाना, इंसान के लिए एक बड़ी क्षति है। हमें अपने मूल सिद्धांतों की रक्षा करनी चाहिए, आधुनिकता के नाम पर वे बलि चढ़ रहे हैं। अंत में डॉ. नरेंद्र ग्रोवर ने अपनी कविता प्रस्तुत की, 'मंदिर में तो कोई भी दीपक जला देगा, कभी किसी के घर में दीपक जला के देखिए।' अपने कविता द्वारा उन्होंने कहा कि वक़्त का हमेशा सम्मान करना चाहिए, क्योंकि वक़्त अगर एक बार साथ छोड़ दे तो फिर कुछ नहीं बचता।
कविताओं का कुछ ऐसा जादुई दौर चल रहा था कि सब ने तय किया कि एक बार फिर चाय पी जाए और कविता पाठ जारी रखा जाए। साढ़े चार बजे तक फिर सबने कुछ रचनाएँ सुनीं और सुनाईं, अगर समय की बंदिश न होती तो अवश्य ही गोष्ठी और चलती। इस कार्यक्रम का वातावरण इतना बाँधने वाला था कि सभी को लगा कि मानों पूरी दोपहर भावपूर्ण हो उठी।
अंत में सबने एक दूसरे को दोबारा दीपावली की अग्रिम शुभकामनाएँ दीं और अपने अपने घरों की ओर प्रस्थान किया। हर बार की तरह, इस बार भी हिंदी राइटर्स गिल्ड की मासिक गोष्ठी सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई। अंत में डॉ. शैलजा सक्सेना ने सभी का धन्यवाद करते हुए नवम्बर में दीपावली के कारण गोष्ठी न होने और दिसम्बर १६ को संस्था का वार्षिकोत्सव के आयोजन की घोषणा की और सब को सादर आमंत्रित किया।
रिपोर्ट: प्रीति अग्रवाल
सहयोग: डॉ. शैलजा सक्सेना

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