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होली महोत्सव
2026

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फागुन के रंग साहित्य के संग

इस कार्यक्रम का वीडियो देखने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें: Click here
21 मार्च को हिन्दी राईटर्स गिल्ड कनाडा द्वारा “फागुन के रंग साहित्य के संग” होली पर एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन Springdale Library Brampton में किया गया । संस्था की निदेशक मंडल की सदस्य कृष्णा वर्मा जी ने इस कार्यक्रम की बागडोर सँभाली और अन्य सदस्यों के सहयोग से कार्यक्रम को निर्देशित किया । मंच संचालक के रूप में डॉ नरेंद्र ग्रोवर जी ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ के साथ अंत तक कार्यक्रम से दर्शकों को जोड़े रखा । सांस्कृतिक और साहित्यिक रंगों का सुंदर समागम प्रस्तुत किया गया । पूरे वातावरण में फागुन की मादकता, उत्सव का उल्लास और लोक-संस्कृति की जीवंत छटा स्पष्ट झलक रही थी।जलपान के तुरंत बाद कार्यक्रम प्रारंभ हुआ । गिल्ड की निदेशक लता पांडे जी ने सबका स्वागत किया ।सबसे पहले तारा वाष्णेय जी द्वारा “ साँवरिया नंद किशोर मेरी सारी पे रंग डाल गयो … व आज बिरज में होली रे रसिया “ जैसे होली के सुन्दर गीतों को अपनी मधुर आवाज़ में गा कर सबका मन मोह लिया । ढोलक पर नीरजा जोशी ने ताल देकर इसे और भी सुन्दर बना दिया । इसके बाद इंदिरा वर्मा जी ने “होली कनक भवन में खेलें रघुबर जी..” गीत से एक भक्तिमय और आनंदमयी शुरुआत की। उनके स्वर में निहित भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने श्रोताओं को तुरंत ही भाव-विभोर कर दिया। फिर उन्होंने “चैत मास बोले रे कोयलिया” (चैती) जैसे पारंपरिक लोकगीत की प्रस्तुति देकर ऋतु परिवर्तन की मधुरता और लोक-संवेदना को सजीव कर दिया। नीरजा जोशी द्वारा ढोलक पर दी गई सशक्त और संतुलित संगत ने इन प्रस्तुतियों को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। उनकी लयबद्ध थाप ने गीतों में ऊर्जा और प्रवाह भर दिया। साथ ही, नीरजा जोशी ने उत्तराखंड की पारंपरिक होली के गीत, “ मेरो रंगीलो देवर घर ए रो छो’ और “होली खेलो जी राधे संभाल के” गा और बजा कर अपनी प्रस्तुति से दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया, कार्यक्रम का प्रभाव इतना जीवंत था कि पूनम चंद्रा मनु और पूनम ममगाईं स्वयं को नृत्य करने से रोक नहीं सकीं।
उनके स्वाभाविक नृत्य ने उत्सव के आनंद को और भी प्रखर बना दिया, मानो पूरा सभागार रंग और संगीत में डूब गया हो।
साहित्यिक पक्ष को समृद्ध करते हुए प्रीति अग्रवाल द्वारा प्रस्तुत लघु कथा “जी बुआ जी” ने कार्यक्रम को एक विचारशील आयाम प्रदान किया। उनकी प्रस्तुति ने हास्य और संवेदना के माध्यम से सामाजिक संबंधों की सूक्ष्मताओं को प्रभावी ढंग से उजागर किया। कृष्णा वर्मा जी ने होली की कविता ’फागुनी झंकार’ पढ़ी
“आहट हुई वसंत की,फ़गुना गईं हवाएँ
कोयल कूकी बाग में ,खिल गईं चहूँ दिशाएँ।”
पूनम चंद्रा मनु ने कृष्ण पर होरी कविता “नभ धरा दामिनी नर नारी रास रंग राग
भाव विभोर हो सब कृष्ण संग खेलें फाग “ पढ़ कर खूब तालियाँ बटोरी । भुवनेश्वरी पांडेय जी ने कविता, “उनको समझने का भरम पाल लिया ,उनके दिल तक पहुँचने का राज़ जान लिया “ सुना कर अपनी आध्यात्मिक चेतना का संदेश दिया । आशा बर्मन जी और आशा मिश्रा जी द्वारा गाये गीत , “होली आई रे कन्हाई रंग छलके “ ने सभी को आनंदित कर दिया । लता पांडे जी ने "बुझा ता की हम बूढ़ा तानी" भोजपुरी कविता सुना कर सभी को ताली बजाने पर मजबूर कर दिया । सरस दरबारी जी ने “ऋतुराज बसंत ने प्रथम आ ,फूलों की सेज सजायी थी।
फागुन की दुल्हन शर्माती ,तब पिया मिलन को आयी थी” कविता से सबका दिल जीत लिया । बरसों बाद गिल्ड वापिस आई रेणुका जी ने अपनी रचना से अपनी रचनात्मक गतिशीलता का एक बार पुनः परिचय दिया । राकेश मिश्र जी ने काशी की होली का वर्णन करते हुए वहाँ के उल्लास इत्मीनान और लठैतों की होली इत्यादि रोचक जानकारी से सबका ज्ञानवर्धन एवं मनोरंजन किया। हर बार की तरह श्रद्धा व मांण्डवी समूह द्वारा बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति दे कर सबका भरपूर मनोरंजन किया ।
पीयूष श्रीवास्तव द्वारा प्रस्तुत दिनकर जी की रश्मिरथी से लिये गये कृष्ण कर्ण संवाद ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।
योगेश ममगाई ने होली पर लिखी अपनी कविता पढ़ी । विद्या भूषण धर व डॉ नरेंद्र ग्रोवर जी ने व्यंग्य के माध्यम से अपने विचार व्यक्त किए । ग्रोवर जी ने, निंदक नीयरे राखिए- व्यंग्य प्रस्तुत कर कार्यक्रम की अंतिम प्रस्तुति दी । विद्या भूषण जी द्वारा सभी का धन्यवाद किया गया । जलपान की सुंदर व्यवस्था के लिए कंचन जी का हृदय से आभार व्यक्त करने के साथ ही कार्यक्रम समाप्त हुआ ।

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