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हमारा समय, साहित्य और युद्ध

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हमारा समय, साहित्य और युद्ध

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भारतीय विक्रम नव संवत्सर 2083 की पहली गोष्ठी का आयोजन,18 अप्रैल, 2026 को स्प्रिंगडेल लाइब्रेरी में आयोजित किया गया।
गिल्ड की सह–संस्थापिका, निर्देशिका आदरणीया शैलजा सक्सेना जी ने नूतन वर्ष की इस गोष्ठी की नई परिकल्पना से सबको अवगत कराया । इसमें चार नए सत्रों को व्यवस्थित रूप से जोड़ा गया – पुस्तक चर्चा, विशिष्ट लेखक, मुख्य विषय और नए अतिथि स्वागत। इस नई रूपरेखा की सबने भरपूर प्रशंसा की और आनंद उठाया।
उन्होंने गोष्ठी के प्रथम भाग के संचालन का उत्तरदायित्व प्रीति अग्रवाल जी को दिया।
पहले सत्र, पुस्तक चर्चा की प्रथम वक्ता थीं आदरणीया प्रतिभा सिवाच जी। वह गिल्ड से पहली बार जुड़ी थी । उन्होंने 'द सीक्रेट लेक' नामक बाल उपन्यास की चर्चा की। रोमांच और रहस्य से भरे इस उपन्यास में बच्चों की कल्पना को विकसित करने की कितनी क्षमता है ,यह स्पष्ट रूप से उभर कर आया।
पुस्तक चर्चा के अंतर्गत दूसरी वक्ता आदरणीया सरस दरबारी जी थी। उन्होंने डायरी शैली में लिखे उपन्यास "कौन देश के वासी –वेणु की डायरी" की चर्चा की। यह आधुनिकता और परंपराओं के संघर्ष की सुंदर कहानी थी और उनकी विस्तृत चर्चा के बाद सभी दर्शकों में इसे पढ़ने की जिज्ञासा और अधिक बढ़ गई ।
इसके पश्चात शैलजा सक्सेना जी ने श्री राजीव मुद्गल द्वारा लिखित "ओ यास्मीन" नामक उपन्यास की चर्चा की। बेहद अनूठी बनावट लिए, इस कहानी में काव्य होने जैसा आभास होता है।
पुस्तक चर्चा के बाद, दूसरा सत्र, इस माह के विशिष्ट लेखक, पंडित माखनलाल चतुर्वेदी जी, को समर्पित किया गया। देव पुरस्कार, पद्म भूषण और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित आधुनिक काल के महाकवि पंडित माखनलाल चतुर्वेदी जी की साहित्यिक यात्रा से जुड़े कुछ विशेष तथ्यों पर विचार विमर्श किया गया।
इस कड़ी में सबसे पहले कृष्णा वर्मा जी को मंच पर आमंत्रित किया गया । उन्होंने प. माखनलाल चतुर्वेदी जी की जीवनी का, उनकी रचनाओं के उल्लेख के साथ बहुत ही सुंदर और विस्तृत वर्णन किया।
दूसरे वक्ता थे वरिष्ठ साहित्यकार एवं अंतर्राष्ट्रीय लेखक आदरणीय डॉक्टर मनोहर गोरे जी। वे संस्था के साथ पहली बार जुड़ रहे थे।
उन्होंने बड़े ही विस्तृत ढंग से पंडित माखनलाल चतुर्वेदी जी के साहित्यिक जीवन के अनकहे- अनसुने संदर्भों का वर्णन किया। उनके ज्ञानपूर्ण वक्तव्य को सुनकर सारी सभा मुग्ध हो गई। उन्होंने खंडवा की गलियों से भारतीय आत्मा का सुहाना सफर बहुत ही सहज एवं सार्थक रूप में सबके साथ साझा किया।
तत्पश्चात मंच की शोभा बढ़ाने आदरणीया सविता अग्रवाल जी आईं और पंडित माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा लिखित कविता "बिटिया अब ससुराल चली" का बहुत सुंदर वाचन किया ।
इसके बाद पूनम चंद्र मनु जी ने मंच पर माखनलाल चतुर्वेदी जी की सदाबहार कविता "पुष्प की अभिलाषा" का भावपूर्ण वाचन किया ।
इन दोनों सत्रों के सफल समापन के पश्चात जलपान के लिए 15 मिनट का विराम लिया गया। इस बार जलपान की व्यवस्था सीमा बागला जी ने की थी। उनका शुभकामनाओं सहित, हार्दिक धन्यवाद किया गया।
आगे के कार्यक्रम को अतिरिक्त ऊर्जा और गति प्रदान करने के लिए मंच संचालन की डोर आदरणीया डॉक्टर शैलजा सक्सेना जी के कुशल हाथों में सौंपी गई।
शैलजा जी के पी. एच.डी का मुख्य विषय था, “स्वातंत्र्योत्तर काव्य में युद्ध की भूमिका।"
युद्ध के इतिहास पर बात करते हुए, उन्होंने अपना वक्तव्य भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्तियाँ "राजनीति समझे सकल, जाने तत्व विचार, पहिचाने निज धर्म को, जाने शिष्टाचार" से प्रारंभ किया । उन्होंने राजनीति की सकलता , अर्थात पूर्ण एजेंडा को समझने की बात कही ।
सर्वप्रथम उन्होंने मंच पर आदरणीय जगमोहन सांगा जी को आमंत्रित किया जिन्होंने अपनी सुंदर पंक्तियों द्वारा युद्ध की विडंबना को दर्शाया कि किस प्रकार मासूम बच्चे क्रूरता का शिकार बनते हैं, जिनकी युद्ध में कोई भूमिका ही नहीं होती। शैलजा जी ने मोहम्मद जायसी की "पद्मावत" की चर्चा करते हुए दर्शाया कि पहले भी जो युद्ध हुए हैं, उनको साहित्यकार किस रूप में देखते हैं । इस संदर्भ में अमीर खुसरो की ख़ज़ाइन–उल– फुतूह नामक पुस्तक में, उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी की प्रशंसा करते हुए मोहम्मद जायसी की पंक्तियों को रखा था, कि वे प्रशंसा नहीं करते थे, तथ्य को बताते थे। शैलजा जी ने यह भी कहा कि साहित्यकार को अपनी भूमिका तय करनी होगी कि वह होने वाले युद्ध में किसी पक्ष को लेने की बजाय मनुष्यता का पक्ष चुनते हुए तथ्यों को बताएँ ना कि उसको अपनी रुचि के अनुसार तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करें ।
इसके पश्चात उन्होंने कनिका वर्मा जी को मंच पर आमंत्रित किया। अप्रैल में आयोजित "ब्राम्पटन पोएट्री प्रोजेक्ट 2026" में उनकी कविता " काँच की पत्तियाँ" चयनित हुई और ब्राम्पटन शहर के विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर उसे प्रदर्शित किया जा रहा है। प्रथम बार एक हिंदी प्रवासी कवित्री को इस प्रकार का सम्मान मिला है । सबने जोरदार तालिया के बीच उनका मंच पर स्वागत किया और उनसे उनके अनुभव को रुचिपूर्वक सुना ।
डॉ नरेंद्र ग्रोवर जी ने भी वर्तमान युद्ध को लेकर एक सार्थक टिप्पणी प्रस्तुत की जिसमें उन्होंने कहा कि युद्ध कभी भी समाप्त नहीं होता। या तो प्रत्यक्ष रूप में हो रहा होता है या फिर उसकी तैयारी चल रही होती है।
डॉ. बंदिता सिन्हा ने अपनी सुंदर, स्वरचित कविता के आरंभ में कहा, “आज का समय एक अजीब सी खामोशी में डूबा है, चेहरे पर मुस्कान है पर अंदर कहीं कुछ टूटा है।” उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध जैसे कठिन समय में, इतिहास ही ऐसी शक्ति है जो लोगों में आशा और शांति के दीप प्रज्वलित करती है।
प्रीति अग्रवाल जी ने अपने लघु कथा "भूख" के माध्यम से बताया कि जहाँ थोड़ी–सी भूख जीवन में प्रगति लाती है, अनियंत्रित भूख, स्वार्थ और लोभ का प्रचंड रूप धारण कर लेती है और संघर्षों और युद्ध का कारण भी बनती है ।
योगेश ममगाईं जी ने अपने आलेख द्वारा कहा कि मानवीय संवेदनाओं का निर्मल जलाशय अब परस्पर द्वेष, ईर्ष्या, भेदभाव व स्वार्थ जैसी विसंगतियों का एक गहरा दलदल बनता जा रहा है। युद्ध में कभी भी कोई विजेता नहीं होता, मानवता की सदैव हार ही होती है।
आदरणीय अलका गोरे जी गिल्ड में पहली बार आई थीं। उन्होंने वर्तमान युद्ध के संदर्भ में भारत में फिलहाल हुए एलपीजी सिलेंडर की कमी को आधार बनाकर एक स्वरचित लघुकथा सुनाई।
प्रतिभा सिवाच जी 5 वर्ष इजराइल में रही हैं और वहाँ हुए युद्ध का आँखों देखा अनुभव उन्होंने सबके साथ साझा किया और बताया कि जहाँ एक तरफ युद्ध और विनाश हो रहा होता है वहीं विश्व में दूसरे कोनों में जीवन समानांतर रूप से चल रहा होता है।
अंत में अंकिता सिंह जी ने "ईट, प्रे एंड लव" नामक अंग्रेज़ी पुस्तक पर आधारित प्रेम के पक्ष में एक बहुत सुंदर , स्वरचित कविता सुनायी।
कार्यक्रम के अंत में शैलजा सक्सेना जी ने यही गुहार लगाई के साहित्यकार को अपने समय को रेखांकित करना चाहिए और सारी राजनीति को समझते हुए मनुष्यता का पक्षधर होना चाहिए।
दिल्ली के मूल निवासी, गिल्ड में पहली बार आए, युवा साहित्य अनुरागी, प्रणव गाँधी जी ने सबको अपना परिचय दिया और आगे भी गोष्ठियों में आते रहने का आश्वासन दिया ।
इसी के साथ हिंदी राइटर्स गिल्ड कनाडा की एक और गोष्टी सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
-प्रीति अग्रवाल

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