“सुनो माधवी” नाट्य पाठ एवं “डिफेक्टिव” उपन्यास का लोकार्पण कार्यक्रम
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19 सितंबर को आयोजित विशेष साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम हिंदी प्रेमियों के लिए एक यादगार अवसर बन गया। कार्यक्रम में अमेरिका से पधारीं प्रतिष्ठित अनुवादिका एवं लेखिका वसुधा सहस्रबुद्धे जी की उपस्थिति विशेष आकर्षण का केंद्र रही। उन्होंने अपने चर्चित नाटक ‘सुनो माधवी’ के चयनित अंशों का पाठ किया, जिसने उपस्थित साहित्यप्रेमियों को नाटक के कथ्य, संवेदनाओं और पात्रों की भावभूमि से गहराई से जोड़ा।
कार्यक्रम का संचालन शैलजा जी ने अपने सधे हुए और प्रभावी अंदाज़ में किया। उन्होंने वसुधा जी का परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके साहित्यिक एवं रचनात्मक योगदान से श्रोताओं को अवगत कराया। इसके बाद वसुधा जी ने ‘सुनो माधवी’ के अंशों का पाठ किया, जिसे श्रोताओं ने अत्यंत रुचि और एकाग्रता के साथ सुना।
जल्लपान के पश्चात कार्यक्रम के दूसरे सत्र में टोरंटो की लोकप्रिय लेखिका एवं रेडियो प्रस्तुतकर्ता पूनम कासलीवाल के दूसरे उपन्यास ‘डिफेक्टिव’ का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर साहित्यप्रेमियों एवं लेखकों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की।
पुस्तक लोकार्पण के सत्र का मंच संचालन संदीप सिंह जी ने कुशलतापूर्वक किया। डॉ. कनिका वर्मा और सरस दरबारी जी ने उपन्यास ‘डिफेक्टिव’ पर अपने विचार व्यक्त करते हुए इसकी विषयवस्तु, संवेदनशीलता और साहित्यिक पक्षों पर प्रकाश डाला।
उनके विचारों ने उपस्थित श्रोताओं को पुस्तक को एक अलग दृष्टिकोण से समझने का अवसर दिया।
इसके पश्चात लेखिका पूनम कासलीवाल ने अपनी लेखन-यात्रा तथा ‘डिफेक्टिव’ के सृजन की पृष्ठभूमि के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने अपने लेखन से जुड़े अनुभव और उपन्यास के पीछे की सोच को श्रोताओं के साथ साझा किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि समीर लाल ‘समीर’ ने अपने सारगर्भित एवं प्रेरणादायी उद्गारों से आयोजन को गरिमापूर्ण समापन प्रदान किया। उन्होंने साहित्य और हिंदी भाषा के प्रति निरंतर सक्रिय रहने तथा रचनात्मक प्रयासों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर अपने विचार साझा किए।
साहित्य, रंगमंच, संवाद और सृजन से भरपूर यह आयोजन हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति समर्पित लोगों की सक्रिय भागीदारी का सुंदर उदाहरण रहा। अमेरिका और कनाडा से जुड़े साहित्यकारों की उपस्थिति ने इस आयोजन को अंतरराष्ट्रीय हिंदी साहित्य के एक जीवंत मंच का रूप दिया।
19 सितंबर का यह दिन हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति से प्रेम करने वाले सभी लोगों को समर्पित रहा—एक ऐसा दिन, जिसने शब्दों को मंच दिया, रचनाओं को पाठकों से जोड़ा और हिंदी के प्रति प्रेम को और अधिक सशक्त किया।
-रिपोर्ट पूनम कासलीवाल